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Ambedkar Nagar News: केश दान से सम्मान की रक्षा, संध्या की पहल
Tue, 03 Feb 2026 10:48 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अम्बेडकरनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, अम्बेडकरनगर
Updated Tue, 03 Feb 2026 10:48 PM IST
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संध्या राजभर।
अंबेडकरनगर। कैंसर की जंग लड़ रहे मरीजों के लिए कीमोथेरेपी का दौर केवल शारीरिक कष्ट ही नहीं लाता, बल्कि उनके आत्मसम्मान को भी गहरी चोट पहुंचाता है।
उपचार के दौरान बाल झड़ जाने के कारण मरीज अक्सर हीन भावना का शिकार हो जाते हैं और स्वयं को समाज से काटने लगते हैं। ऐसे कठिन समय में बाल दान उनके खोए हुए आत्मविश्वास को लौटाने और जीवन में नई उम्मीद जगाने का एक सशक्त माध्यम बन रहा है। अकबरपुर की रहने वाली अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता संध्या राजभर इस दिशा में एक मिसाल पेश कर रही हैं। संध्या अब तक तीन बार कैंसर रोगियों के लिए अपने बाल दान कर चुकी हैं। संध्या बताती हैं कि उन्हें यह प्रेरणा एक कैंसर पीड़ित महिला की स्थिति देखकर मिली।
कीमोथेरेपी के कारण उस महिला के बाल गिर गए थे, जिससे दुखी होकर उसने घर से बाहर निकलना ही बंद कर दिया था। इस घटना ने संध्या को झकझोर दिया। उन्होंने महसूस किया कि कैंसर की लड़ाई सिर्फ दवाइयों से ही नहीं, बल्कि संबल और आत्मसम्मान से भी जीती जाती है। इसी उद्देश्य के साथ संध्या ने एक संस्था के माध्यम से पहली बार अपने पूरे केश दान किए। इसके बाद उन्होंने दो बार मानक के अनुसार बाल दान कर इस सिलसिले को जारी रखा। संध्या न केवल स्वयं इस नेक कार्य में जुटी हैं, बल्कि अपनी महिला रिश्तेदारों और परिचितों को भी बाल दान के प्रति जागरूक कर रही हैं। उनका मानना है कि पीड़ितों को मानसिक सहारा देना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है, ताकि कोई भी मरीज इस लड़ाई में खुद को अकेला न समझे।
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उपचार के दौरान बाल झड़ जाने के कारण मरीज अक्सर हीन भावना का शिकार हो जाते हैं और स्वयं को समाज से काटने लगते हैं। ऐसे कठिन समय में बाल दान उनके खोए हुए आत्मविश्वास को लौटाने और जीवन में नई उम्मीद जगाने का एक सशक्त माध्यम बन रहा है। अकबरपुर की रहने वाली अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता संध्या राजभर इस दिशा में एक मिसाल पेश कर रही हैं। संध्या अब तक तीन बार कैंसर रोगियों के लिए अपने बाल दान कर चुकी हैं। संध्या बताती हैं कि उन्हें यह प्रेरणा एक कैंसर पीड़ित महिला की स्थिति देखकर मिली।
कीमोथेरेपी के कारण उस महिला के बाल गिर गए थे, जिससे दुखी होकर उसने घर से बाहर निकलना ही बंद कर दिया था। इस घटना ने संध्या को झकझोर दिया। उन्होंने महसूस किया कि कैंसर की लड़ाई सिर्फ दवाइयों से ही नहीं, बल्कि संबल और आत्मसम्मान से भी जीती जाती है। इसी उद्देश्य के साथ संध्या ने एक संस्था के माध्यम से पहली बार अपने पूरे केश दान किए। इसके बाद उन्होंने दो बार मानक के अनुसार बाल दान कर इस सिलसिले को जारी रखा। संध्या न केवल स्वयं इस नेक कार्य में जुटी हैं, बल्कि अपनी महिला रिश्तेदारों और परिचितों को भी बाल दान के प्रति जागरूक कर रही हैं। उनका मानना है कि पीड़ितों को मानसिक सहारा देना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है, ताकि कोई भी मरीज इस लड़ाई में खुद को अकेला न समझे।
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