{"_id":"628146f53d1d3e4df156d057","slug":"nilesh-is-spreading-the-light-of-knowledge-by-defeating-disability-ambedkar-nagar-news-lko630753736","type":"story","status":"publish","title_hn":"दिव्यांगता को मात दे ज्ञान की रोशनी फैला रहे नीलेश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दिव्यांगता को मात दे ज्ञान की रोशनी फैला रहे नीलेश
विज्ञापन
अंबेडकरनगर के सिपाह गांव में दिव्यांग नीलेश की निशुल्क पाठशाला में मौजूद बच्चे। संवाद
- फोटो : AMBEDKAR NAGAR
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आलापुर (अंबेडकरनगर)। दिव्यांग नीलेश के हौसले आसमान छू रहे हैं। दिव्यांगता को मात देते हुए उन्होंने न सिर्फ बीटीसी की डिग्री हासिल की वरन बच्चों का भविष्य संवारने के लिए उन्हें निशुल्क शिक्षा भी दे रहे हैं। वे सुबह-शाम अपने गांव सिपाह में ही प्रतिदिन लगभग 60 बच्चों को जिम्मेदारी के साथ पढ़ाते हैं ताकि बच्चे बेहतर समाज व राष्ट्र का निर्माण कर सकें। कोरोना काल में बच्चों की शिक्षा बाधित न हो, इसके लिए उन्हें पढ़ाना शुरू कर दिया। बच्चों के लिए निशुल्क शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराई जो अब भी जारी है। उनके इस प्रयास की क्षेत्र में खासी चर्चा है। दिव्यांग नीलेश पशुओं से लगाव के लिए भी जाने जाते हैं।
सिपाह गांव निवासी नीलेश यादव दिव्यांगता को पीछे छोड़ते हुए समाज में नया आदर्श स्थापित कर रहे हैं। बैसाखी के सहारे चलने वाले नीलेश जीवन में रुकने के बजाय सकारात्मक सोचने और उसे क्रियान्वित करने पर जोर देते हैं। जब ज्यादातर दिव्यांग परेशान व लाचार होकर एकाकी जीवन अपनाने लगते हैं, तब ऐसे समय में दिव्यांग नीलेश खुद को कहीं से कमजोर साबित नहीं होने देते।
बीटीसी की डिग्री हासिल करने वाले नीलेश ने वर्ष 2017 में बाल गोपाल एकेडमी की स्थापना कर निशुल्क शिक्षा देने का जिम्मा संभाला। उस समय इक्का-दुक्का बच्चे ही पहुंच रहे थे। बाद में कोरोना संक्रमण की शुरुआत होने पर विद्यालयों के बंद होने का सिलसिला शुरू हो गया। नीलेश ने अभिभावकों से कहा कि उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं है। वे बच्चों को निशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराएंगे।
विज्ञापन
नतीजतन उनके घर शिक्षा लेने के लिए बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। कोरोना संक्रमण के दौरान 50 से अधिक बच्चे सुबह-शाम उनके घर पढ़ने आया करते थे। नीलेश से पढ़ने के लिए कक्षा एक से लेकर नौ तक के बच्चे आते हैं। वह प्रतिदिन पूरी लगन से बच्चों को पढ़ाते हैं। उनके इस प्रयासों की क्षेत्र में खासी सराहना भी होती है।
ऐसे समय में जब शिक्षा का व्यवसायीकरण बढ़ता जा रहा है, तब लगभग 60 बच्चों को निशुल्क शिक्षा देना, समाज के प्रति बड़े योगदान का सबब माना जा रहा है। नीलेश कहते हैं कि वह नौकरी के लिए प्रयास कर रहे हैं लेकिन फिर भी चाहते हैं कि बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते रहें। उनका कहना है कि घर-परिवार व समाज की बेहतरी एवं प्रगति शिक्षा के जरिए ही संभव है।
अन्य सामाजिक कार्यों में भी रुचि
दिव्यांग नीलेश की रुचि सिर्फ निशुल्क शिक्षा देने तक ही सीमित नहीं है, वे अक्सर असहायों की मदद करते भी देखे जाते हैं। रक्तदान जैसे कार्यक्रम में भी भागीदारी करने से पीछे नहीं हटते। पशुओं को लेकर उनकी रुचि भी खासी चर्चा में रहती है। बंदरों को प्रतिदिन चना व बिस्किट खिलाना उनकी दिनचर्या में शामिल है। उन्हें देखते ही अक्सर बंदर नजदीक आ जाते हैं। वे उनसे इतना घुलमिल गए हैं कि उनके हाथों से ही चना आदि लेकर खाते देखे जा सकते हैं।
विज्ञापन
सिपाह गांव निवासी नीलेश यादव दिव्यांगता को पीछे छोड़ते हुए समाज में नया आदर्श स्थापित कर रहे हैं। बैसाखी के सहारे चलने वाले नीलेश जीवन में रुकने के बजाय सकारात्मक सोचने और उसे क्रियान्वित करने पर जोर देते हैं। जब ज्यादातर दिव्यांग परेशान व लाचार होकर एकाकी जीवन अपनाने लगते हैं, तब ऐसे समय में दिव्यांग नीलेश खुद को कहीं से कमजोर साबित नहीं होने देते।
विज्ञापन
बीटीसी की डिग्री हासिल करने वाले नीलेश ने वर्ष 2017 में बाल गोपाल एकेडमी की स्थापना कर निशुल्क शिक्षा देने का जिम्मा संभाला। उस समय इक्का-दुक्का बच्चे ही पहुंच रहे थे। बाद में कोरोना संक्रमण की शुरुआत होने पर विद्यालयों के बंद होने का सिलसिला शुरू हो गया। नीलेश ने अभिभावकों से कहा कि उन्हें निराश होने की जरूरत नहीं है। वे बच्चों को निशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराएंगे।
विज्ञापन
नतीजतन उनके घर शिक्षा लेने के लिए बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। कोरोना संक्रमण के दौरान 50 से अधिक बच्चे सुबह-शाम उनके घर पढ़ने आया करते थे। नीलेश से पढ़ने के लिए कक्षा एक से लेकर नौ तक के बच्चे आते हैं। वह प्रतिदिन पूरी लगन से बच्चों को पढ़ाते हैं। उनके इस प्रयासों की क्षेत्र में खासी सराहना भी होती है।
ऐसे समय में जब शिक्षा का व्यवसायीकरण बढ़ता जा रहा है, तब लगभग 60 बच्चों को निशुल्क शिक्षा देना, समाज के प्रति बड़े योगदान का सबब माना जा रहा है। नीलेश कहते हैं कि वह नौकरी के लिए प्रयास कर रहे हैं लेकिन फिर भी चाहते हैं कि बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते रहें। उनका कहना है कि घर-परिवार व समाज की बेहतरी एवं प्रगति शिक्षा के जरिए ही संभव है।
अन्य सामाजिक कार्यों में भी रुचि
दिव्यांग नीलेश की रुचि सिर्फ निशुल्क शिक्षा देने तक ही सीमित नहीं है, वे अक्सर असहायों की मदद करते भी देखे जाते हैं। रक्तदान जैसे कार्यक्रम में भी भागीदारी करने से पीछे नहीं हटते। पशुओं को लेकर उनकी रुचि भी खासी चर्चा में रहती है। बंदरों को प्रतिदिन चना व बिस्किट खिलाना उनकी दिनचर्या में शामिल है। उन्हें देखते ही अक्सर बंदर नजदीक आ जाते हैं। वे उनसे इतना घुलमिल गए हैं कि उनके हाथों से ही चना आदि लेकर खाते देखे जा सकते हैं।

अंबेडकरनगर के सिपाह गांव में बंदरों को चना खिलाते दिव्यांग नीलेश। -संवाद- फोटो : AMBEDKAR NAGAR