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विशेष पूजा अर्चना के साथ मना गोवर्धन पूजा पर्व
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अंबेडकरनगर के अरियाबाजार में गोवर्धन पूजा करतीं महिलाएं व युवतियां
- फोटो : AMBEDKAR NAGAR
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अंबेडकरनगर। समूचे जिले में सोमवार को गोवर्धन पूजा धूमधाम से हुई। कार्तिक मास की प्रतिपदा तिथि को गोवर्धन पूजा का उत्सव वर्षों से मनाया जाता है। इस दिन बलि पूजा, अन्नकूट, मार्गपाली आदि उत्सव भी हुआ। अन्नकूट या गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से प्रारम्भ हुई है। गोवंशों आदि पशुओं को स्नान कराकर फूलमाला, धूप, चन्दन आदि लगाकर पूजन अर्चन किया गया।
कई जगह गोबर से गोवर्धन पर्वत का निर्माण कर परंपरा के तहत पूजा अर्चना की गई। जिला मुख्यालय के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में इस परंपरा का निर्वहन श्रद्घा के साथ हुआ। उधर कायस्थ समाज के लोगों ने भगवान चित्रगुप्त के जयंती मौके पर कलम दवात की पूजा कर अपनी परंपरा का निर्वहन किया। अपने परिवार व व्यापार में तरक्की के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।
सोमवार को जिले के विभिन्न हिस्सों में गोवर्धन पूजा विधि विधि विधान से हुई। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण गाय चराते हुए गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि हजारों गोपियां गोबर्धन पर्वत के पास छप्पन भोग लगाकर बडे उत्साह से नाच-गाकर उत्सव मना रही हैं। श्री कृष्ण के पूंछने पर गोपियों ने बताया कि मेघों के स्वामी इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए प्रतिवर्ष यह उत्सव मनाया जाता है। तब श्री कृष्ण बोले कि यदि देवता प्रत्यक्ष आकर भोग लगाएं, तब तो इस उत्सव की कीमत है। गोपियां बोली कि तुम्हें इस तरह इन्द्र की निन्दा नही करनी चाहिए। भगवान इन्द्र की कृपा से ही वर्षा होती है।
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श्री कृष्ण बोले कि वर्षा तो गोबर्धन पर्वत के कारण होती है और हमें इन्द्र की जगह गोबर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। सभी गोप ग्वाल अपने अपने घर से पकवान लाकर श्रीकृष्ण की बताई गई विधि से गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे। भगवान इन्द्र को जब पता चला कि इस वर्ष मेरी पूजा न कर गोबर्धन पर्वत की पूजा की जा रही है तो वह बहुत कुपित हुए और मेघों को आज्ञा दिया कि गोकुल में इतना पानी बरसाओ कि वहां पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाय। इन्द्र की आज्ञानुसार मेघ मूसलाधार वर्षा करने लगे।
इधर श्रीकृष्ण ने सभी गोप गोपियों को आदेश दिया कि सब अपने अपने गाय बछडों के साथ गोबर्धन पर्वत की तराई में पहुंच जाएं। गोबर्धन ही इन मेघों से रक्षा करेंगे। सब गोप-गोपियां अपने अपने गाय, बछडों को लेकर गोबर्धन पर्वत की तराई में पहुंच गए। श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठ ऊंगली पर धारण कर छाता सा तान दिया, और सब ब्रजवासी सात दिन तक गोवर्धन पर्वत की शरण में रहे। भगवान के सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर जल की एक बूंद भी नहीं पडी।
तब ब्रह्माजी ने इन्द्र को बताया कि पृथ्वी पर भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म ले लिया है, और उनसे तुम्हारा बैर लेना उचित नहीं है। श्री कृष्ण के अवतार की बात जानकर इन्द्रदेव अपनी गलती पर बहुत लज्जित हुए, और भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करने लगे। भगवान श्रीकृष्ण ने सातवें दिन गोबर्धन पर्वत को नीचे रखकर ब्रजवासियों से कहा कि अब तुम प्रतिवर्ष गोबर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मनाया करो और तभी से यह पर्व के रूप में प्रचलित हो गया। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए सोमवार को जिले विभिन्न क्षेत्रों में गोवर्धन की पूजा हुई। अरिया बाजार में श्रद्घालुओं ने गोबर का गोवर्धन पर्वत तैयार किया, और परंपरा के अनुसार पूजन अर्चन किया।
सोमवार को गायत्री मंदिर परिसर में अखिल भारतीय कायस्थ महासभा ने भगवान चित्रगुप्त के जन्मदिन मौके पर कलम दवात की पूजा अर्चना की। कायस्थ समाज में मान्यता है कि इसी दिन भगवान चित्रगुप्त का जन्म हुआ था। उन्होंने समाज को तरक्की के पथ पर आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया। इसी मान्यता के तहत कायस्थ समाज प्रत्येक वर्ष पूरी परंपरा के साथ कलम दवात की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं।
सोमवार को इसी परंपरा के तहत कायस्थ समाज ने गायत्री मंदिर परिसर में पुरोहित विद्यासागर पाण्डेय ने हवन पूजन कराया। इस मौके पर जिलाध्यक्ष महेश प्रताप श्रीवास्तव, डॉ राधेरमण श्रीवास्तव, दानबहादुर, केके श्रीवास्तव, सुरेंद्र, रवि प्रकाश, डॉ सुधांशू, दुर्गेश, हिमांशु, संदीप, प्रभास चन्द्र आदि मौजूद रहे।
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कई जगह गोबर से गोवर्धन पर्वत का निर्माण कर परंपरा के तहत पूजा अर्चना की गई। जिला मुख्यालय के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में इस परंपरा का निर्वहन श्रद्घा के साथ हुआ। उधर कायस्थ समाज के लोगों ने भगवान चित्रगुप्त के जयंती मौके पर कलम दवात की पूजा कर अपनी परंपरा का निर्वहन किया। अपने परिवार व व्यापार में तरक्की के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।
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सोमवार को जिले के विभिन्न हिस्सों में गोवर्धन पूजा विधि विधि विधान से हुई। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण गाय चराते हुए गोवर्धन पर्वत की तराई में पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि हजारों गोपियां गोबर्धन पर्वत के पास छप्पन भोग लगाकर बडे उत्साह से नाच-गाकर उत्सव मना रही हैं। श्री कृष्ण के पूंछने पर गोपियों ने बताया कि मेघों के स्वामी इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए प्रतिवर्ष यह उत्सव मनाया जाता है। तब श्री कृष्ण बोले कि यदि देवता प्रत्यक्ष आकर भोग लगाएं, तब तो इस उत्सव की कीमत है। गोपियां बोली कि तुम्हें इस तरह इन्द्र की निन्दा नही करनी चाहिए। भगवान इन्द्र की कृपा से ही वर्षा होती है।
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श्री कृष्ण बोले कि वर्षा तो गोबर्धन पर्वत के कारण होती है और हमें इन्द्र की जगह गोबर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। सभी गोप ग्वाल अपने अपने घर से पकवान लाकर श्रीकृष्ण की बताई गई विधि से गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे। भगवान इन्द्र को जब पता चला कि इस वर्ष मेरी पूजा न कर गोबर्धन पर्वत की पूजा की जा रही है तो वह बहुत कुपित हुए और मेघों को आज्ञा दिया कि गोकुल में इतना पानी बरसाओ कि वहां पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न हो जाय। इन्द्र की आज्ञानुसार मेघ मूसलाधार वर्षा करने लगे।
इधर श्रीकृष्ण ने सभी गोप गोपियों को आदेश दिया कि सब अपने अपने गाय बछडों के साथ गोबर्धन पर्वत की तराई में पहुंच जाएं। गोबर्धन ही इन मेघों से रक्षा करेंगे। सब गोप-गोपियां अपने अपने गाय, बछडों को लेकर गोबर्धन पर्वत की तराई में पहुंच गए। श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठ ऊंगली पर धारण कर छाता सा तान दिया, और सब ब्रजवासी सात दिन तक गोवर्धन पर्वत की शरण में रहे। भगवान के सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर जल की एक बूंद भी नहीं पडी।
तब ब्रह्माजी ने इन्द्र को बताया कि पृथ्वी पर भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म ले लिया है, और उनसे तुम्हारा बैर लेना उचित नहीं है। श्री कृष्ण के अवतार की बात जानकर इन्द्रदेव अपनी गलती पर बहुत लज्जित हुए, और भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा याचना करने लगे। भगवान श्रीकृष्ण ने सातवें दिन गोबर्धन पर्वत को नीचे रखकर ब्रजवासियों से कहा कि अब तुम प्रतिवर्ष गोबर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मनाया करो और तभी से यह पर्व के रूप में प्रचलित हो गया। इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए सोमवार को जिले विभिन्न क्षेत्रों में गोवर्धन की पूजा हुई। अरिया बाजार में श्रद्घालुओं ने गोबर का गोवर्धन पर्वत तैयार किया, और परंपरा के अनुसार पूजन अर्चन किया।
सोमवार को गायत्री मंदिर परिसर में अखिल भारतीय कायस्थ महासभा ने भगवान चित्रगुप्त के जन्मदिन मौके पर कलम दवात की पूजा अर्चना की। कायस्थ समाज में मान्यता है कि इसी दिन भगवान चित्रगुप्त का जन्म हुआ था। उन्होंने समाज को तरक्की के पथ पर आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया। इसी मान्यता के तहत कायस्थ समाज प्रत्येक वर्ष पूरी परंपरा के साथ कलम दवात की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं।
सोमवार को इसी परंपरा के तहत कायस्थ समाज ने गायत्री मंदिर परिसर में पुरोहित विद्यासागर पाण्डेय ने हवन पूजन कराया। इस मौके पर जिलाध्यक्ष महेश प्रताप श्रीवास्तव, डॉ राधेरमण श्रीवास्तव, दानबहादुर, केके श्रीवास्तव, सुरेंद्र, रवि प्रकाश, डॉ सुधांशू, दुर्गेश, हिमांशु, संदीप, प्रभास चन्द्र आदि मौजूद रहे।