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Ambedkar Nagar News: दुश्मनों को हराया पर अपनों की बेकदरी ने दी टीस

Sat, 26 Jul 2025 12:27 AM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अम्बेडकरनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, अम्बेडकरनगर Updated Sat, 26 Jul 2025 12:27 AM IST
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Defeated the enemies but the disrespect of loved ones caused pain
अंबेडकरनगर। कारगिल युद्ध में दुश्मनों को सबक सिखाने वाले जवान आज व्यवस्था से परेशान हैं। दुश्मनों के षड्यंत्र को हरा देने वाले वीर सपूत आज प्रशासन की बेकद्री से आजिज हैं। युद्ध से लौटने के बाद 1999 में किए गए अनगिनत वादे आज भी अधूरे हैं। जवानों को इसका मलाल है। कुछ ऐसी ही पीड़ा है भीटी तहसील के घरवासपुर निवासी इंद्रजीत यादव की। इंद्रजीत 1988 में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे।
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1999 में जब कारगिल युद्ध छिड़ा तो वह सरहद पर तैनात थे। कारगिल युद्ध में शामिल होने वाले जिले के इकलौते जवान थे। युद्ध में बम से घायल होने के बाद भी वह हौसला नहीं हारे थे। 30 सितंबर 2012 को नायब सूबेदार के पद से सेवानिवृत्त हुए थे और वर्तमान में इंद्रजीत यादव अमेठी जिले में स्थित इंडो गल्फ फैक्टरी में ट्रांसपोर्ट इंचार्ज के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने जिला प्रशासन के समक्ष मिझौड़ा-महरुआ मार्ग के धार्मिक स्थल ब्रह्म बाबा से घरवासपुर गांव को पिच मार्ग से जोड़ने की मांग रखी थी।
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अभी तक यह मांग पूरी नहीं हो सकी। इसका मलाल उन्हें आज तक है। प्रशासन ने वर्ष 1999 में युद्ध से लौटने के बाद प्रवेश द्वार बनवाने, पांच बीघा जमीन पट्टा देने की घोषणा की थी हालांकि अभी तक तीन बीघा जमीन ही मिल सकी है। आज तक प्रवेश द्वार भी नहीं बना है। सेवानिवृत्त होने के बाद जो रकम मिली थी उससे कारगिल विजय द्वार के नाम पर ब्रह्म बाबा देव स्थान का गेट बनवाया था।
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बेटे को सेना में भर्ती कराने की आस रह गई अधूरी
इंद्रजीत यादव के पुत्र आदर्श सीएमओ कार्यालय में संविदा कर्मचारी हैं। अंकित फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक्स का व्यापार मिझौड़ा चौराहा पर करते हैं। सौरभ अभी एमबीए की तैयारी कर रहे हैं। वह पुत्र अंकित को स्नातक की पढ़ाई कराने के बाद सेना में भेजने की तैयारी कर रहे थे। इसकी दौड़ वर्ष 2021 में निकाल ली थी। मेडिकल भी हो गया था। इसी बीच केंद्र सरकार की ओर से अग्निवीर योजना आ गई। अंकित की लिखित परीक्षा नहीं हो पाई थी। इसकी टीस आज भी इंद्रजीत को सताती है।


बम लगने से हुए थे घायल
इंद्रजीत बताते हैं कि कारगिल युद्ध के समय वह 18 ग्रेनेडियर (टाइगर हिल परमवीर चक्र बटालियन) के सैनिक थे। 23 मई 1999 आर्मी हेडक्वार्टर से उनकी बटालियन को सोलोलीन पहुंचने के आदेश मिले। 25 मई को 94 जवानों की उनकी टुकड़ी विमावर पहुंची। वहां पहले से मौजूद 16 ग्रेनेडियर की टुकड़ी से छिपते हुए दुश्मन की लोकेशन ली गई। दुश्मन 12 हजार मीटर ऊंचाई से हर हरकत पर नजर रख रहा था। जरा सी आहट मिलते ही गालियों की बौछार हो जाती। 27 मई की रात 10:30 बजे बटालियन आगे बढ़ने लगी। आहट मिलते ही दुश्मन बम व गोलियां बरसाने लगे। 31 मई को 12 हजार मीटर ऊंची चोटी पर पहुंचे थे। बटालिक ब्राॅस सेंटर में तोलोलिंग पहाड़ी पर बम की चपेट में आने से इंद्रजीत घायल हो गए थे। खून से लथपथ होने के बाद भी दुश्मन से मोर्चा लेकर कारगिल फतेह कर वहां उनकी बटालियन ने तिरंगा लहरा दिया था।
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