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अफसोस : जहां जिस हास्पिटल में सिखाई डॉक्टरी, वहीं बेबस होकर तोड़ा दम

Sat, 24 Apr 2021 10:07 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 24 Apr 2021 10:07 PM IST
सार

  • सर्जन डॉ. जेके मिश्रा की चार दिन पहले हुई थी उपचार के दौरान मौत
  • डॉक्टर पत्नी रमा मिश्रा ने अस्पताल की व्यवस्थाओं पर उठाए सवाल

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Where the doctorate taught, it broke down unaided
prayagraj news : डॉ. जेके मिश्र (फाइल फोटो)। - फोटो : prayagraj

विस्तार

शहर के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. जेके मिश्रा ने एक सरकारी अस्पताल में तकरीबन पांच दशक तक पढ़ाया और लोगों का उपचार किया। उनके पढ़ाए हुए आज न केवल आज उसी अस्पताल में डॉक्टर हैं बल्कि दुनिया भर में मरीजों की सेवा कर रहे हैं, लेकिन, उन्हें जब कोविड ने अपनी चपेट में लिया तो उन्हें देखने वाला कोई नहीं मिला। उन्होंने अपनी डॉक्टर पत्नी के सामने ही दम तोड़ दिया। 
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शहर की वरिष्ठ गॉयनोकोलॉजिस्ट व मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर रहीं डॉक्टर रमा मिश्रा (80) और उनके पति डॉ. जेके मिश्रा (सर्जन) दोनों कोरोना पॉजिटिव हुए। दोनों ही सरकारी चिकित्सालय में भर्ती रहे। डॉ. रमा तो संक्रमण की जद से बाहर आ गईं, लेकिन उनके पति डॉ. जेके मिश्रा कोरोना से जंग हार गए। पति की मौत के बाद डॉ. रमा मिश्रा द्वारा अस्पताल की सेवाओं को लेकर कहीं गईं बातें सोशल मीडिया वायरल हो रही हैं। 
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खुद रातभर फर्श पर पड़ीं रहीं डॉक्टर

डॉ. रमा मिश्रा के मुताबिक कोविड रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद पहले दोनों लोग होम क्वारंटीन में ही रहे, लेकिन उनका ऑक्सीजन लेवल कम था। मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने ही सलाह दी कि सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दीजिए। हालांकि उस अस्पताल में बेड की बहुत क़िल्लत थी। 13 अप्रैल को अस्पताल के कोविड वॉर्ड में सिर्फ एक ही बेड मिल सका। डॉक्टर रमा मिश्रा ने बताया कि उस रात वह फ़र्श पर ही पड़ी रहीं, क्योंकि बेड उपलब्ध नहीं था, अगले दिन उन्हें बेड मिला। डॉ. रमा का कहना है कि उस रात डॉक्टर साहब को कोई इंजेक्शन लगाया गया, लेकिन उन्हें नहीं बताया कि कौन सा इंजेक्शन है।
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दूसरे दिन सुबह फिर इंजेक्शन लगा दिया। वहां रात में हमने जो देखा, वो बेहद डरावना था। रात भर मरीज चिल्लाते रहते थे। कोई उन्हें देखने वाला नहीं था। बीच-बीच में जब नर्स आती थी या डॉक्टर आते थे तो डांटकर चुप करा देते थे या कोई इंजेक्शन दे देते थे। उनमें से कई लोग सुबह सफ़ेद कपड़े में लपेटकर बाहर कर दिए जाते थे, यानी उनकी मौत हो चुकी होती थी।

जूनियर उड़ा रहे थे मखौल
डॉ. रमा के मुताबिक अस्पताल में कोरोना के एक अफसर उनके जूनियर रहे हैं। भर्ती होने के अगले दिन वो यहाँ आए तो हमें देखकर चौंक गए। हंसते हुए बोले कि अरे आप लोग कैसे यहाँ आ गए? कुछ देर तक रहे, हाल-चाल लिया, लेकिन उन्होंने भी कुछ नहीं बताया कि आपको क्या हुआ है और क्या ट्रीटमेंट दिया जा रहा है। उसके बाद फिर वो एक बार भी देखने नहीं आए। 


नहीं था वेंटिलेटर, चली गई पति की जान
रात में वार्ड ब्वाय तक नहीं रहता था। सिर्फ एक जूनियर डॉक्टर आते थे। वो भी केवल ऑक्सीजन का लेवल देखकर चले जाते थे। तीन दिनों तक यही क्रम चलता रहा। 16 अप्रैल को डॉक्टर जेके मिश्रा की तबीयत ज्यादा ख़राब हो गई, ऑक्सीजन लेवल लगातार कम हो रहा था। एक इंजेक्शन और लगाया गया तो उससे उनकी सांस रुकने लगी। हमने वहां मौजूद एक व्यक्ति से इस बारे में कहा तो उसने लापरवाही से जवाब दिया कि ये सब तो इस बीमारी में होना ही है। अस्पताल में वेंटिलेटर नहीं था। एक महिला डॉक्टर दूसरी मंजिल से वेंटिलेटर लाने के लिए गई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और उनके पति की मौत हो चुकी थी। उधर अस्पताल में मरीजों के उपचार में लगे डॉक्टरों का कहना है कि डॉ. जेके मिश्रा की मौत कार्डियक अरेस्ट से हुई है। उनके इलाज में कोई कमी नहीं की गई। डॉक्टर रमा मिश्रा की दूसरी कोविड रिपोर्ट 17 अप्रैल को निगेटिव आई और रात में वो अपने घर आ गईं। उनका कहना है कि कोविड वॉर्डों में कम से कम एक ओर शीशा होना चाहिए ताकि अंदर क्या हो रहा है, ये मरीज के परिजन भी जान सकें।
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