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जब मुबारक ने गाई उमाकांत की कजरी

Thu, 21 Jul 2016 01:07 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Thu, 21 Jul 2016 01:07 AM IST
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When Mubarak sung of Umakant Kajree
मुबारक बेगम - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अपने गीतों की तरह जानीमानी गायिका मुबारक बेगम भी अमर हुईं तो यादों के झरोखे से कुछ रिश्ते और झांकने लगे। इलाहाबाद की आबोहवा ही कुछ ऐसी है कि कोई यहां की आंच में तपकर कुंदन बना तो किसी को यहां की मिट्टी के लेप ने चंदन बना दिया। मुबारक बेगम भी इसकी अपवाद नहीं रहीं। वह न यहां जन्मी, पली-बढ़ीं, पढ़ीं लेकिन आकाशवाणी और संगमनगरी का आकर्षण उन्हें कई-कई बार यहां खींच लाया।
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प्रख्यात गीतकार उमाकांत मालवीय की लिखी और मुबारक की गाई कजरी ‘सावन मास पिया परदेसा, पापी जिया घबराय रे’ आज भी खूब चर्चित है। इसका डेमो यहीं मुबारक बेगम सहित आकाशवाणी के स्टाफ आर्टिस्ट रघुनाथ सेठ और उमाकांत मालवीय की मौजूदगी में तैयार हुआ था, बाद में उसे स्टुडियो में अंतिम रूप दिया गया। कहते हैं, इस कजरी को गाते समय मुबारक काफी भावुक हो गई थीं। रिकार्डिंग के दौरान कजरी की पंक्ति ‘हरी-हरी तुलसी हमरे अंगनवा, सावन में कुम्हलाय रे’ में कुम्हलाय को लेकर मूलत: राजस्थान की मुबारक को कुछ दिक्कतें आ रही थीं। उमाकांत जी ने शब्द बदलने को कहा तो वह बोलीं, कोई जरूरत नहीं, मैं इसे उसी भाव से पूरा करूंगी।
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गीतकार यश मालवीय कहते हैं, इस कजरी से जुड़ा किस्सा भी अजीब है। तब एलपी हुआ करती थी और मुबारक बेगम ने अपने हस्ताक्षर से उसे भेजा था। मालवीय नगर वाले घर में पार्सल मिला को सभी बहुत खुश थे लेकिन रिकार्ड प्लेयर नहीं था कि उसे सुना जा सके। सो हम सभी अहियापुर में रमेश मालवीय के घर गए जहां कई अन्य रचनाकार मित्रों की मौजूदगी में कजरी सुनने का जश्न मनाया गया। मुबारक, महादेवी जी से मिलने और उनसे उनके गीत लेने उनके घर भी गई थीं, पर तब लता मंगेशकर ने महादेवी के गीतों के लिए हामी भर दी थी सो मुबारक मिलकर लौट आई थीं। आज वह नहीं हैं तो तमाम यादें फिर ताजा हो गई हैं।
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