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स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति और इस्तीफे में फर्क नहीं
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Thu, 29 Sep 2016 01:52 AM IST
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय
- फोटो : PTI
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इलाहाबाद। हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेना या इस्तीफा देना एक ही बात है। दोनों में कोई फर्क नहीं है। यह नियोक्ता और कर्मचारी के बीच करार का विषय है। इसलिए इस्तीफा देने वाला कर्मचारी भी पेंशन और सेवानिवृत्ति परिलाभ पाने का हकदार है। कोर्ट ने इलाहाबाद के शिवचरणदास कन्हैया लाल इंटर कॉलेज से 30 वर्ष की सेवा के बाद इस्तीफा देने वाले प्रवक्ता को दो माह के भीतर पेंशन और सेवानिवृत्ति परिलाभ के भुगतान का आदेश दिया है।
इस्तीफा देने वाले प्रवक्ता डा. रामकिशोर शुक्ल ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। वरिष्ठ अधिवक्ता राधाकांत ओझा और पीयूष शुक्ल ने जिरह की कि पारिवारिक समस्या के कारण याची ने इस्तीफा दिया था जिसे बाद में वापस लेने की भी अर्जी दी। मगर प्रबंधन ने कहा कि इस्तीफा स्वीकार हो चुका है। इसी आधार पर पेंशन देने से भी इंकार कर दिया। कहा गया कि सेवा नियमावली के अनुसार 25 वर्ष के सेवा के बाद कर्मचारी पेंशन पाने का हकदार हो जाता है। याची ने 30 वर्ष की सेवा पूरी की है। इसलिए उसे पेंशन तथा अन्य परिलाभ दिए जाने चाहिए।
कोर्ट ने तमाम न्यायिक निर्णय के आधार पर मत दिया कि इस्तीफा या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दोनों ही सेवा समाप्ति का एक तरीका है। इसके जरिए सेवायोजक और कर्मचारी के बीच समझौते का समापन हो जाता है। दोनों ही तरीकों में ऐसा कुछ अलग नहीं होता जिससे कोई फर्क समझा जा सके। याची 30 वर्ष की सेवा पूरी कर चुका है इसलिए उसे पेंशन देने से इंकार नहीं किया जा सकता है।
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इस्तीफा देने वाले प्रवक्ता डा. रामकिशोर शुक्ल ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। वरिष्ठ अधिवक्ता राधाकांत ओझा और पीयूष शुक्ल ने जिरह की कि पारिवारिक समस्या के कारण याची ने इस्तीफा दिया था जिसे बाद में वापस लेने की भी अर्जी दी। मगर प्रबंधन ने कहा कि इस्तीफा स्वीकार हो चुका है। इसी आधार पर पेंशन देने से भी इंकार कर दिया। कहा गया कि सेवा नियमावली के अनुसार 25 वर्ष के सेवा के बाद कर्मचारी पेंशन पाने का हकदार हो जाता है। याची ने 30 वर्ष की सेवा पूरी की है। इसलिए उसे पेंशन तथा अन्य परिलाभ दिए जाने चाहिए।
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कोर्ट ने तमाम न्यायिक निर्णय के आधार पर मत दिया कि इस्तीफा या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दोनों ही सेवा समाप्ति का एक तरीका है। इसके जरिए सेवायोजक और कर्मचारी के बीच समझौते का समापन हो जाता है। दोनों ही तरीकों में ऐसा कुछ अलग नहीं होता जिससे कोई फर्क समझा जा सके। याची 30 वर्ष की सेवा पूरी कर चुका है इसलिए उसे पेंशन देने से इंकार नहीं किया जा सकता है।
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