यूपी विधानसभा चुनाव 2022 : कुंभ में प्रयागराज की तस्वीर तो बदली, पर एक-एक कर हटाए जा रहे विभाग से उपेक्षा की टीस बढ़ी
पिछले चुनाव में प्रयागराज मंडल की 28 में से 22 सीटेें भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने जीतीं। इस दौरान प्रयागराज में 12 में से नौ तो कौशाम्बी की सभी तीन, फतेहपुर की सभी छह एवं प्रतापगढ़ जिले की सात में चार सीटें भाजपा और उसके सहयोगी दलों के खाते में आईं।
विस्तार
चुनाव करीब आते भाजपा के कद्दावर नेताओं में शुमार और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने मथुरा में मंदिर निर्माण का मुद्दा उठाकर पार्टी की रणनीति तो जरूर जाहिर कर दी है लेकिन प्रयागराज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह जिला अब पहचान के संकट से जूझ रहा है। एक-एक कर कई विभाग मुख्यालय लखनऊ शिफ्ट हो चुके हैं। कुछ बचे हैं तो उनको भी जल्द हटाने की तैयारी है। जिस ‘इलाहाबादी अमरूद’ के चर्चे कभी हर तरफ होते थे, उसका नामलेवा नहीं है।
प्रोत्साहन न मिलने से अमरूद उत्पादक निराश हैं और इस बार तो उन्हें काफी नुकसान भी हुआ है। इन सबके बीच बेरोजगारी बड़ा सवाल बनकर उभरी है। आयोगों के दरवाजे पर नौकरियां मांग रहे युवाओं की भीड़ कहीं ज्यादा बढ़ गई है। इसका असर प्रयागराज ही नहीं, मंडल की सभी विधानसभा सीटों पर पड़ने का अनुमान राजनीतिज्ञ विशेषज्ञों ने लगाया है।
मंडल की 28 में से 22 सीटें भाजपा और सहयोगी दलों के पास
पिछले चुनाव में प्रयागराज मंडल की 28 में से 22 सीटेें भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने जीतीं। इस दौरान प्रयागराज में 12 में से नौ तो कौशाम्बी की सभी तीन, फतेहपुर की सभी छह एवं प्रतापगढ़ जिले की सात में चार सीटें भाजपा और उसके सहयोगी दलों के खाते में आईं। भाजपा के लिए इस बार इन सभी सीटों पर कमल खिलाना एक बड़ी चुनौती है। प्रयागराज की ही बात करें तो यहां वर्ष 2019 में लगे कुंभ मेले के पूर्व विकास के ढेरों कार्य हो गए।
इस वजह से पूरे शहर की सूरत ही बदल गई। कई फ्लाई ओवर, रेल ओवर ब्रिज, रेल अंडर ब्रिज का चौड़ीकरण, प्रयागराज संगम और सूबेदारगंज रेलवे स्टेशन को टर्मिनल के रूप में विकसित करना आदि तमाम कार्य यहां हुए। यहां बना नया एयरपोर्ट का टर्मिनल भी मील का पत्थर साबित हुआ। हालांकि इतना सब कम होने के बाद भी कसर अब भी बाकी है। शहर उत्तरी के तमाम मोहल्लों में रहने वाली हजारों की आबादी हर वर्ष आने वाली बाढ़ से स्थायी निजात चाहती है।
सलोरी के बृजेश शर्मा कहते हैं कि सरकारें आती हैं जाती हैं, वादें भी करती हैं लेकिन बाढ़ की विभाषिका से अब तक कोई निजात नहीं दिला सका है। अवकाश प्राप्त शिक्षक एनपी त्यागी कहते हैं कि प्रयागराज में डबल इंजन वाली सरकार ने ढेरों विकास कार्य किए, लेकिन चिकित्सा के क्षेत्र में यह शहर अब भी पिछड़ा हुआ है। लंबे समय से यहां एम्स की मांग की जा रही है। कुछ संगठन इसके लिए अभियान भी चला रहे हैं लेकिन प्रदेश में सर्वाधिक आबादी वाले इस जिले में अब तक एम्स को लेकर सरकार द्वारा कोई भी उल्लेखनीय कदम नहीं उठाया जा सका है।
यमुनापार में पानी बना बड़ी समस्या
भौगौलिक दृष्टि से प्रयागराज सूबे के अन्य मंडलों से थोड़ा भिन्न है। यहां एक ओर गंगा-यमुना का दोआबा है तो वहीं दूसरी ओर यमुनापार से ही बुंदेलखंड का पथरीला इलाका भी शुरू हो जाता है। इन सब इलाकों की अपनी अलग-अलग समस्याएं भी हैं। यमुनापार के शंकरगढ़, लोहगरा, बारा आदि इलाकों में पानी की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। लोहगरा के महेंद्र यादव कहते हैं कि पहले कांग्रेस और उसके बाद बसपा, सपा और भाजपा की सरकारें आईं लेकिन पानी की समस्या जस की तस है।
यमुनपार के ही जसरा ब्लॉक के ध्रुव कुमार मालवीय कहते हैं कि प्रयागराज से चित्रकूट को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग पर जसरा में रेल ओवर ब्रिज बनाने की मांग लंबे समय से की जा रही है लेकिन सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है। इसी तरह मेजा की कताई मिल भी दो दशक से बंद है। स्थानीय निवासी रमाकांत पांडेय कहते हैं कि इस कताई मिल को लेकर नेताओं की तरफ से आश्वासन के अलावा आज तक और कुछ भी नहीं मिला।
हंडिया से मेजा के लिए गंगा पर पुल वर्षों पुरानी मांग
प्रयागराज के गंगापार स्थित हंडिया से अगर किसी को मेजा, मांडा या सिरसा जाना है तो उसे वाया मिर्जापुर या फिर नैनी होते हुए ही जाना पड़ता है। यहां गंगा पर पुल बनाने की मांग लंबे समय से की जा रही है। यहां पुल बन जाने के बाद लोगों को जहां लंबा चक्कर लगाने से निजात मिलेगी तो वहीं गंगापार से मध्य प्रदेश की सीधी कनेक्टिविटी भी हो जाएगी। हालांकि डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य जिला पंचायत अध्यक्ष केशपथ ग्रहण समारोह में पुल बनाने का एलान कर चुके हैं, लेकिन स्थानीय लोग यही चाहते हैं कि यह कार्य जल्द से जल्द शुरू हो।
कई कार्यालय लखनऊ शिफ्ट होने का भी मुद्दा
प्रयागराज से विगत कुछ वर्ष में आबकारी, पुलिस मुख्यालय समेत तमाम सरकारी कार्यालयों के मुख्यालय लखनऊ शिफ्ट होने का मुद्दा विपक्ष के कुछ नेता इस बार जोर शोर से उठा रहे हैं। मेरठ और आगरा में पश्चिमी यूपी में हाईकोर्ट बेंच की मांग स्थापित करने की मांग का प्रयागराज में शुरू से ही विरोध कर रहे हैं। पिछले दिनों कानून मंत्री किरण रिजजू द्वारा दिए गए बयान के बाद यह मामला उठा तो स्थानीय अधिवक्ताओं की नाराजगी तो देखते हुए कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह को बयान देना पड़ा कि हाईकोर्ट की बेंच वहां स्थापित नहीं हो रही है।
नैनी की बंद इकाइयों को कब मिलेगी संजीवनी
नैनी की बंद इकाईयां इस बार चुनाव का बड़ा मुद्दा बन गई हैं। हाल ही में बीपीसीएल बंद होने का मामला जोर शोर से उठा। सीएम योगी तक भी यह मामला गया। एक कमेटी का गठन होने के बाद बैठक भी हुई, लेकिन नतीजा कुछ भी नहीं निकला। नैनी के रवि श्रीवास्तव बताते हैं कि बीपीसीएल, टीएसएल, आईटीआई समेत कई बड़ी इकाईयां या तो बंद हो चुकी हैं या बंद होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। इन औद्योगिक इकाईयों को संजीवनी मिल जाए तो हजारों की संख्या में स्थानीय नौजवानों को रोजगार उपलब्ध हो जाएगा। सरस्वती हाईटेक सिटी का भी विकास बेहद धीमी गति से हो रहा है।
दो कैबिनेट मंत्रियों के साथ डिप्टी सीएम की कर्मभूमि भी है प्रयागराज
अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में शहर पश्चिमी से कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह और दक्षिण विधानसभा से कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी को इन दोनों सीटों से दावेदार माना जा रहा है। डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की कर्मभूमि होने की वजह से उनके शहर उत्तरी विधानसभा से चुनाव लड़ने के कयास लगाए जा रहे हैं। प्रयागराज में यमुनापार की करछना और गंगापार की प्रतापपुर ऐसी सीट है, जहां अब तक कमल नहीं खिल सका है। करछना से इस बार सपा से राज्यसभा सदस्य रेवती रमण सिंह के पुत्र उज्ज्वल रमण का चुनाव लड़ना तय माना जा रहा है। उज्ज्वल वर्तमान समय इस सीट से सपा के विधायक भी हैं।
किसी एक का नहीं रहा वर्चस्व, फीकी होती जा रही अमरूद की मिठास
प्रयागराज को तोड़कर कौशाम्बी को जिले के रूप में भले ही तब्दील कर दिया गया हो लेकिन आज भी कौशाम्बी की पहचान प्रयागराज से ही है। स्थानीय निवासी देवेंद्र सिंह बताते हैं कि बीते कुछ चुनाव से यहां किसी एक दल का वर्चस्व नहीं रहा। 2017 के चुनाव में पहली बार भाजपा ने इस जिले की सभी तीन सीटें जीतीं। इसमें सिराथू सीट ऐसी रही, जिसमें भाजपा लगातार दूसरी बार जीती। इस सीट से वर्ष 2012 में कमल खिलाने में वर्तमान डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य कामयाब रहे।
इस बार सिराथू सीट से उनके चुनाव लड़ने के कयास लगाए जा रहे हैं। उनके बड़े पुत्र योगेश मौर्य भी इस सीट पर खासे सक्त्रिस्य हैं। यहां के अमरूद उत्पादक किसान रमेश यादव कहते हैं कि कौशाम्बी जिले के लाल अमरूद विश्व प्रसिद्ध हैं, लेकिन बीते कुछ वर्ष से अमरूद में कीड़े लग जाने से यहां इसके उत्पादकों को लंबा नुकसान झेलना पड़ रहा है। डा. जितेंद्र द्विवेदी का कहना है कि बौद्ध सर्किट के रूप में भी यह जिला शामिल है, लेकिन पर्यटन की दृष्टि से यहां अभी उल्लेखनीय काम नहीं हुए हैं। इतना जरूर है कि यहां कई रेल ओवर ब्रिज, रेल अंडर ब्रिज का निर्माण बीते पांच वर्ष में जरूर हो गया है।
बड़े सियासी नामों के साथ आंवला भी है बेल्हा की पहचान
प्रतापगढ़ जिले की पहचान बड़े सियासी नामों के साथ आंवला की वजह से भी है। यहां बड़े पैमाने पर आंवले का उत्पादन होता है, लेकिन किसानों को इसका सीधा फायदा नहीं मिल पाता। किसान जितेंद्र सिंह कहते हैं कि प्रदेश सरकार की तरफ से आंवला को ओडीओपी (वन डिस्ट्रिक वन प्रोडक्ट) योजना में शामिल किए जाने के बाद भी किसानों का भला नहीं हो सका। आंवला की पैकेजिंग, ब्रांडिंग कर बड़ा बाजार उपलब्ध कराने के दावे घोषणाओं तक ही सीमित रह गए। अपनी जनसभाओं में खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी आंवले को देश-विदेश तक पहचान दिलाने का वादा किया, लेकिन हालत यह है कि आंवले का उत्पादन पहले के मुकाबले घटा है। किसान उदयभान सिंह कहते हैं कि आंवला किसानों के लिए घोषणाएं तो बहुत हुईं, लेकिन उन्हें अमल में नहीं लाया जा सका। शहर समेत कई अन्य इलाकों में खारे पानी की समस्या का भी समाधान नहीं ढूंढा जा सका।
राजाभैया और प्रमोद तिवारी का है दबदबा
जिले की सात विधानसभा सीटों में से कुछ बड़े सियासतदानों के आधिपत्य में है। कुंडा में रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया 1993 से लगातार छठवीं बार विधायक हैं। बगल की सीट बाबागंज पर भी एक तरह से उनका कब्जा है। उनके समर्थक विनोद सरोज यहां से लगातार तीसरी बार विधायक हैं। रामपुर खास विधानसभा सीट 1980 से कांग्रेस के कब्जे में है। यहां से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी लगातार नौ बार विधायक रहे। अब उनकी बेटी आराधना मिश्रा मोना विधायक हैं। पट्टी सीट से काबीना मंत्री राजेंद्र प्रताप सिंह मोती सिंह विधायक हैं। वह इस सीट से चार बार विधायक रह चुके हैं।
सरकारें बदली लेकिन दस वर्ष बाद भी अधूरा है बाईपास
फतेहपुर जनपद की बिंदकी विधानसभा में बाईपास का निर्माण दस वर्ष बाद भी अधूरा ही है। कस्बे के विनय तोमर बताते हैं कि वर्ष 2011 में बसपा शासनकाल में इसका निर्माण शुरू हुआ। बसपा, सपा और अब भाजपा का कार्यकाल है लेकिन बाईपास निर्माण पूरा नहीं हो सका। इसी तरह जहानाबाद विधानसभा क्षेत्र में तीन दशकों से नहर में पानी न आने और रोजगार न होने का प्रमुख मुद्दा रहा है। किसान जगरुप यादव ने बताया कि क्षेत्र के किसानों की पहली जरूरत सिंचाई की होती है पर तीन दशक से अमौली बिजौली माइनरों में पानी न आने से किसान परेशान है।
स्थानीय निवासी रेशू बाजपेई ने बताया कि पूरे विधानसभा क्षेत्र में एक भी ऐसी फैक्ट्री नहीं है जिसमें बेरोजगारों को रोजगार मिल सके। सदर विधानसभा के कलक्टरगंज निवासी एवं व्यापारी शिवप्रसाद मिश्र दुर्गेश कहते हैं कि क्षेत्र में सबसे बड़ा मुद्दा जलनिकासी का है। खागा के धाता कस्बे के रहने वाले भाून प्रताप कहते हैंकि वर्षों से यहां पर चीनी मिल की मांग हो रही हैं। इसके साथ ही किशनपुर में यमुना नदी पर पुल भी निर्माणाधीन हैं। हालांकि हुसैनगंज विधानसभा क्षेत्र में गंगा पर बन रहा पुल यहां के विकास और व्यापार को गति दे सकता है।