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हाल-ए-आयुष्मान योजना: 'साहेब खाना खाए का पैसा नहीं, दवईया कहां से लाऊब, मरी जाब', महंगी दवा लेने को मजबूर लोग

Thu, 01 Jun 2023 10:18 PM IST
आकाश दुबे अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: आकाश दुबे Updated Thu, 01 Jun 2023 10:18 PM IST
सार

जो मरीज आयुष्मान कार्ड के दम पर इलाज के लिए स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल पहुंचते हैं। इलाज शुरू होने के बाद जब वह दवा लेने आयुष्मान पैनल की अमृत फार्मेसी पहुंचते हैं, तो उन्हें महंगी दवाइयां बाहर से लेने के लिए कहा जाता है।

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Unavailability of medicines in Amrit Pharmacy in Prayagraj people are forced to buy expensive medicines from o
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

साहेब हम बहुत गरीब मनई हई, खाए का पैसा नहीं हई, इतनी महंगी दवईया कहां से लाऊब, मरी जाब साहेब...मरी जाब। ये शब्द कई ऐसे गरीब मरीजों के परिजनों के हैं, जो आयुष्मान कार्ड के दम पर इलाज के लिए स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल पहुंचते हैं। इलाज शुरू होने के बाद जब वह दवा लेने आयुष्मान पैनल की अमृत फार्मेसी पहुंचते हैं, तो उन्हें महंगी दवाइयां बाहर से लेने के लिए कहा जाता है। एसआरएन में आयुष्मान लाभार्थियों को दवा उपलब्ध कराने के लिए अमृत फार्मेसी को पैनल में शामिल किया गया है। ऐसे में अगर किसी मरीज का इलाज आयुष्मान योजना के अंतर्गत होता है तो उसे दवा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी अमृत फार्मेसी की है। मगर अस्पताल में भर्ती मरीजों के परिजनों का कहना है कि उन्हें बाहर से दवा लेने के लिए फार्मेसी मजबूर करती है।

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केस नंबर 1
करछना निवासी 50 वर्षीय राम चरन के पास दो वक्त रोटी का ठिकाना नहीं है। उन्हें पेट में दर्द के चलते 23 मई को एसआरएन अस्पताल में भर्ती किया गया। आयुष्मान कार्ड धारक होने कारण बिना किसी खर्च के चिकित्सकों ने इलाज शुरू कर दिया। सस्ती दवाईयां तो फार्मेसी से मिल गई, मगर महंगी दवा के लिए उन्हें बाहर से खरीदने पर मजबूर किया गया। मरीज राम चरन की पत्नी रामपति का कहना है कि वह कहां से रूपये लाएं दवाईयों के लिए समझ में नहीं आ रहा, दस हजार की दवाई पहले ही खरीदी जा चुकी है। है। अब तो खाने के भी लाले पड़ गए हैं।

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केस नंबर 2
मेजा निवासी 50 वर्षीय शिव शंकर केसरी को नवंबर में कैसर के इलाज के लिए एसआरएन अस्पताल में भर्ती किया गया था। इस दौरान उनके बेटे विनोद केसरी, जो कि चांट का ठेला लगाते हैं, को 20 हजार से अधिक कीमत की दवाईयां बाहर से खरीदनी पड़ी। उन्हें कहा गया कि दवा स्टॉक में नहीं हैं। ऐसे में उन्हें बाहर से दवा लेनी पड़ेगी। वहीं ऑपरेशन के बाद पिता को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। मगर दवाईयों में जो रूपए खर्च हुए, आज भी विनोद उस कर्ज को चुका रहे हैं।

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केस नंबर 3
ब्रेस्ट कैंसर की शिकायत के चलते झलवा की रहने वाली 52 वर्षीय सुषमा देवी को एसआरएन अस्पताल में 17 अप्रैल को भर्ती किया गया था। उनके भतीजे अखिलेश ने बताया कि इलाज के दौरान सिर्फ तीन इंजेक्शन हीं अंदर से मिलता था। बाकी सारी दवाईयां बाहर से लेनी पड़ी। आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद 35 हजार से अधिक कीमत की दवाई उन्होंने बाहर से खरीदी है। वह एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं। मिलने वाले वेतन से घर का खर्च चलाना मुश्किल होता है।

एक करोड़ से अधिक का बकाया है। अब बताईए कहां से दवाईयों का स्टॉक पूरा करें। जब दवाईयां ही नहीं होगी तो कहां से देंगे। -देवेंद्र, अमृत फार्मेसी, एसआरएन

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