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तीन दशक से हर चुनाव में ‘इमरजेंसी’ जैसी हार
अमित सरन, इलाहाबाद।
Updated Tue, 12 Jul 2016 02:19 AM IST
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उत्तर प्रदेश में तीन दशक पहले कांग्रेस ऐसे बिखरी कि फिर संभल नहीं सकी। कांग्रेस के लिए इस बार भी यूपी में विधानसभा चुनाव की राह आसान नहीं होगी। प्रचार में कौन चेहरा प्रभावी रहेगा और और किसको टिकट देना सही निर्णय होगा, इन तमाम मुद्दों से इतर कांग्रेसियों के साथ मंथन कर रहे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के लिए भी पुराने आंकड़े किसी चुनौती से कम नहीं। तीन दशक पहले यूपी के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 269 सीटों पर सफलता मिली थी। इसके बाद छह चुनाव हुए। अगर सभी चुनावों में कांग्रेस को मिली कुल सीटें जोड़ ली जाएं तो भी 1985 जैसी सफलता नहीं मिली। पिछले छह चुनाव में कांग्रेस को महज 242 सीटों पर ही सफलता मिली।
पिछले तीन दशक में हुए हर चुनाव के दौरान कांग्रेस की वही स्थिति रही, जो इमरजेंसी के तत्काल बाद 1977 के चुनाव में हुई थी। इस चुनाव में कांग्रेस को महज 47 सीटें मिलीं और जनता पार्टी ने 352 सीटों पर जीत दर्ज कर सरकार बनाई। इसके बाद 1980 के चुनाव में कांग्रेस की वापसी हुई और 309 सीटों के साथ प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी। 1985 के चुनाव में भी 269 सीटों के साथ कांग्रेस ने सरकार बनाई लेकिन इसके बाद कांग्रेस का पतन शुरू हो गया। 1989 के चुनाव में सभी क्षेत्रीय दल कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हो गए। इस चुनाव तक जनता पार्टी में भी बिखराव हो चुका था। यह दल टूटकर जनता दल (जेपी) और लोकदल में बंट चुका था।
वहीं, एक गुट ने अलग होकर जनता दल नाम से एलायंस बना लिया था, जिसमें भाजपा को भी शामिल कर लिया गया। इस चुनाव में कांग्रेस मुंह के बल गिरी और 94 सीटों पर सीमित हो गई। जनता दल को 208 सीटों पर जीत मिली और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। इसके बाद कांग्रेस यूपी में उबर नहीं सकी। 1991 के चुनाव में हालत और बिगड़ गई। कांग्रेस को महज 46 सीटों से संतोष करना पड़ा। वहीं, पहली बार स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ी भाजपा को 221 सीटें मिलीं और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। इसके बाद कांग्रेस का ग्राफ और तेजी से गिरा। 1993 के चुनाव में उसे 28, 1996 में 33, 2002 में 25, 2007 में 22 एवं 2012 के चुनाव में 28 सीटें मिलीं।
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जातिवाद की राजनीति से जमे क्षेत्रीय दलों के पांव
यूपी में जातिवाद की राजनीति शुरू होते ही कांग्रेस एवं भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों के पांव उखड़ने लगे और सपा एवं बसपा जैसे दलों ने पैर जमाने शुरू कर दिए। 1990 में मंडल कमीशन लागू होने के बाद 1993 के चुनाव में 67 सीटें पाकर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सबकी नजर में आई जबकि बसपा ने 1991 का चुनाव भी लड़ा था लेकिन उसे महज 12 सीटें मिली थीं। 1993 में बसपा ने सपा से हाथ मिलाया और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बन गए। 1995 में गेस्ट हाउस कांड के बाद बसपा और सपा एक दूसरे के धुर विरोधी हो गए और इसके बाद भाजपा से समर्थन पाकर तीन जून 1995 को मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं। 1996 के चुनाव में भी बसपा को 67 सीटें मिलीं और बसपा ने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई। 2002 के चुनाव में बसपा को और अधिक सीटें (98) मिलीं और मायावती फिर सीएम बनीं। इस बार भी उन्हें भाजपा का साथ मिला और मायावती एक वर्ष 118 दिन सीएम रहीं। इस बीच भाजपा से टकराव के बाद बसपा में फूट पड़ गई और सपा को इसका फायदा मिला। इसके बाद तीन वर्ष 257 दिन मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री रहे। 2007 के चुनाव में 206 सीटों के साथ बसपा ने बहुमत में सरकार बनाई तो 2012 के चुनाव में सपा ने 224 सीटें लेकर बहुमत के साथ सरकार बनाई।
कांग्रेस के बाद गिरा भाजपा का ग्राफ
1991 के चुनाव में कांग्रेस का ग्राफ गिरने के साथ ही भाजपा का ग्राफ चढ़ने लगा था। इस चुनाव में भाजपा की सरकार बनी। 1993 के चुनाव में भी भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा लेकिन 1991 के मुकाबले स्थिति बिगड़ी। भाजपा को 177 सीटें मिलीं। 1996 में 174, 2002 में 88, 2007 में 51 और 2012 के चुनाव में 47 सीटें मिलीं।
ट्रंप कार्ड उतारने को तैयार कांग्रेस
इस विधानसभा चुनाव में आंकड़ों के हिसाब से भाजपा और कांग्रेस की एक जैसी स्थिति है। दोनों ही दलों को उम्मीद है कि इस बार जातिवादी राजनीति के मुद्दे पर विकास का मुद्दा हावी रहेगा, सो दोनों दलों ने पूरा जोर लगा रखा है। यही वजह है कि कांग्रेस इस बार प्रियंका गांधी के रूप में अपना ट्रंप कार्ड चलने की तैयारी में है। अगर कांग्रेस का ट्रंप कार्ड चलता है तो पार्टी के लिए तीन दशक बाद प्रदेश की सत्ता में लौटने का यह बेहतर मौका हो सकता है।
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पिछले तीन दशक में हुए हर चुनाव के दौरान कांग्रेस की वही स्थिति रही, जो इमरजेंसी के तत्काल बाद 1977 के चुनाव में हुई थी। इस चुनाव में कांग्रेस को महज 47 सीटें मिलीं और जनता पार्टी ने 352 सीटों पर जीत दर्ज कर सरकार बनाई। इसके बाद 1980 के चुनाव में कांग्रेस की वापसी हुई और 309 सीटों के साथ प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी। 1985 के चुनाव में भी 269 सीटों के साथ कांग्रेस ने सरकार बनाई लेकिन इसके बाद कांग्रेस का पतन शुरू हो गया। 1989 के चुनाव में सभी क्षेत्रीय दल कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हो गए। इस चुनाव तक जनता पार्टी में भी बिखराव हो चुका था। यह दल टूटकर जनता दल (जेपी) और लोकदल में बंट चुका था।
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वहीं, एक गुट ने अलग होकर जनता दल नाम से एलायंस बना लिया था, जिसमें भाजपा को भी शामिल कर लिया गया। इस चुनाव में कांग्रेस मुंह के बल गिरी और 94 सीटों पर सीमित हो गई। जनता दल को 208 सीटों पर जीत मिली और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने। इसके बाद कांग्रेस यूपी में उबर नहीं सकी। 1991 के चुनाव में हालत और बिगड़ गई। कांग्रेस को महज 46 सीटों से संतोष करना पड़ा। वहीं, पहली बार स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ी भाजपा को 221 सीटें मिलीं और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। इसके बाद कांग्रेस का ग्राफ और तेजी से गिरा। 1993 के चुनाव में उसे 28, 1996 में 33, 2002 में 25, 2007 में 22 एवं 2012 के चुनाव में 28 सीटें मिलीं।
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जातिवाद की राजनीति से जमे क्षेत्रीय दलों के पांव
यूपी में जातिवाद की राजनीति शुरू होते ही कांग्रेस एवं भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों के पांव उखड़ने लगे और सपा एवं बसपा जैसे दलों ने पैर जमाने शुरू कर दिए। 1990 में मंडल कमीशन लागू होने के बाद 1993 के चुनाव में 67 सीटें पाकर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सबकी नजर में आई जबकि बसपा ने 1991 का चुनाव भी लड़ा था लेकिन उसे महज 12 सीटें मिली थीं। 1993 में बसपा ने सपा से हाथ मिलाया और मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बन गए। 1995 में गेस्ट हाउस कांड के बाद बसपा और सपा एक दूसरे के धुर विरोधी हो गए और इसके बाद भाजपा से समर्थन पाकर तीन जून 1995 को मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं। 1996 के चुनाव में भी बसपा को 67 सीटें मिलीं और बसपा ने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई। 2002 के चुनाव में बसपा को और अधिक सीटें (98) मिलीं और मायावती फिर सीएम बनीं। इस बार भी उन्हें भाजपा का साथ मिला और मायावती एक वर्ष 118 दिन सीएम रहीं। इस बीच भाजपा से टकराव के बाद बसपा में फूट पड़ गई और सपा को इसका फायदा मिला। इसके बाद तीन वर्ष 257 दिन मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री रहे। 2007 के चुनाव में 206 सीटों के साथ बसपा ने बहुमत में सरकार बनाई तो 2012 के चुनाव में सपा ने 224 सीटें लेकर बहुमत के साथ सरकार बनाई।
कांग्रेस के बाद गिरा भाजपा का ग्राफ
1991 के चुनाव में कांग्रेस का ग्राफ गिरने के साथ ही भाजपा का ग्राफ चढ़ने लगा था। इस चुनाव में भाजपा की सरकार बनी। 1993 के चुनाव में भी भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा लेकिन 1991 के मुकाबले स्थिति बिगड़ी। भाजपा को 177 सीटें मिलीं। 1996 में 174, 2002 में 88, 2007 में 51 और 2012 के चुनाव में 47 सीटें मिलीं।
ट्रंप कार्ड उतारने को तैयार कांग्रेस
इस विधानसभा चुनाव में आंकड़ों के हिसाब से भाजपा और कांग्रेस की एक जैसी स्थिति है। दोनों ही दलों को उम्मीद है कि इस बार जातिवादी राजनीति के मुद्दे पर विकास का मुद्दा हावी रहेगा, सो दोनों दलों ने पूरा जोर लगा रखा है। यही वजह है कि कांग्रेस इस बार प्रियंका गांधी के रूप में अपना ट्रंप कार्ड चलने की तैयारी में है। अगर कांग्रेस का ट्रंप कार्ड चलता है तो पार्टी के लिए तीन दशक बाद प्रदेश की सत्ता में लौटने का यह बेहतर मौका हो सकता है।