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हाथों का हुनर बंद, दिलों में दफन हुए नटों- बंजारों की करतब दिखाने की कला

Amarujala Local Bureau अमर उजाला लोकल ब्यूरो
Updated Sun, 24 May 2020 05:50 PM IST
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The skill of the hands closed, the art of performing tricks of the nuts and the nuts buried in the hearts
अनूप ओझा प्रयागराज। कलाइयों में चूड़ा, नाक में नथ, पैरों में कड़ियां, कमर पर करधनी, बाहों में बाजूबंद के साथ गले में कौड़ी-सीप, दुवन्नी और चवन्नी की मालाएं पहनकर मुहल्लों, सड़कों की पटरियों पर करतब दिखाने वाली या फिर टेंट लगाकर जड़ी-बूटियां बेचने वाली बंजारन महिलाएं लॉकडाउन में दर-ब-दर हो गई हैं। शहर से गांवों तक सड़कों की पटरियों, खंडहरों या फिर खाली मैदानों के आसपास टेंट लगाकर पारंपरिक खेल, करतब या फिर हींग, जड़ी-बूटियां बेचकर जीविका चलाने वाले बंजारों की आजीविका पर कोरोना संक्रमण बड़ी आफत बन कर आया है। ऐसे बंजारा परिवारों को या तो उनके ठीहों से प्रशासन ने खदेड़ दिया है या फिर संक्रमण फैलने के डर से लोगों ने उनसे दूरी बना ली है। ऐसे में उनके अस्तित्व पर संकट के गहरे बादल छा गए हैं। कहा जा रहा है कि उनके लिए अगर समय रहते कारगर उपाय नहीं किए गए तो बदले हालात में उनकी जिंदगी का अंधेरा छंटना मुश्किल हो जाएगा। यमुना बैंक रोड, पत्थर गिरजा घर, जीपीओ से लेकर परेड मैदान तक सैकड़ों बंजारे अपने शिविरों में रहकर पारंपरिक कला की प्रस्तुतियों के बल पर जीविका चलाने वाले सैकड़ों बंजारा परिवार लॉकडाउन में खदेड़ दिए गए हैं। इनमें बांस केसहारे सिर पर घड़ा या छाली रखकर छोटे बच्चों को लोहे की राड या रस्सी पर चलाकर दिखाने के अलावा बंदर-बंदरिया का नाच दिखाने वाले, बीन बजाकर भीड़ बटोरने वाले सपेरे, दुर्गा, काली, हनुमान या फिर और भी रूपों में लोगों का ध्यान खींचने वाले बहुरुपिये भी शामिल हैं, जो अपनी कला के जरिए लोगों का मनोरंजन भी करते थे और कमाई भी। इनमें नट और बंजारा समुदाय की महिलाएं भी शामिल थीं, जो पारंपरिक रंग-बिरंगे घाघरा और लहंगा पहन कर हारमोनियम और ढोलक पर लोक संगीत की प्रस्तुतियां देकर अपनी जीविका चला रही थीं, लेकिन कोरोना के कहर ने उन्हें इलाका छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया है। लोक संस्कृति के मर्मज्ञ अतुल यदुवंशी बताते हैं कि दर्जन भर से अधिक घुमंतू बंजारा समुदाय के लोग शहर में पत्थर गिरजा, अशोक नगर, बेली, गऊघाट, संगम क्षेत्र, झूंसी और अरैल में रहकर पारंपरिक कला या फिर करतब दिखाकर अपना पेट भरते रहे हैं। लेकिन यह दौर उनके लिए सबसे मुश्किल भरा साबित हुआ है। ऐसे समय उनके लिए ठोस योजना बनाई जानी चाहिए। कोट राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा समेत कई इलाकों से बंजारे प्रयागराज और आसपास के इलाकों में हमेशा अपनी पारंपरिक कला और हस्तशिल्प को लेकर आते रहे हैं। बारिश का मौसम आने पर वह अपने राज्यों में लौट जाते हैं, लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण की वजह से उनकी परेशानियां बढ़ गई हैं। लॉकडाउन में कहीं रुकने या टेंट लगाने की अनुमति न होने की वजह से उनके अस्तित्व पर संकट छा गया है। अतुल यदुवंशी, लोक कलाविद। कोट शहर से लेकर गांवों तक सारंगी लेकर घूमने वाले जोगी,भरथरी गाने वाले,गोदना गोदने वाली महिलाएं, कालबेलिया नृत्य करने वाले बंजारा समुदाय के सपेरे और बांस से पूजा की टोकरी,बर्तन, खिलौने, सूप और अन्य सामग्री बनाकर हस्तशिल्प को नया आयाम देने वाले नटों और बंजारों की तलाश की जा रही है, ताकि इस लॉकडाउन में उनको संस्कृति मंत्रालय की ओर से सहायता दिलाई जा सके। इंद्रजीत ग्रोवर, निदेशक, एनसीजेडसीसी। इनसेट खजूर केपत्तों का पारंपरिक धंधा भी चौपट कोरांव।(संवाद) कोरांव के पड़ोसी गांव में खजूर केपत्तों से झाड़ू बनाकर जीविका चलाने वाले घुमंतू यमुदाय के लोग परेशान हैं। लॉकडाउन में कहीं आने जाने पर रोक की वजह से उनके पारंपरिक धंधे को तगड़ा झटका लगा है। इस कुनबे के बुजुर्ग बब्बू बताते हैं कि लॉकडाउन में कहीं आने जाने पर रोक लग जाने के कारण उनका रोजगार बुरी तरह प्रभावित हो गया है। सरकारी मदद के रूप में खाद्यान्न व नगदी जो मिल रही है उससे परिवार चलाना संभव नहीं रह गया है। इनसेट बांस की टोकरी बनाने वालों को भी हटाया गया हंडिया। भीटी रेलवे स्टेशन के बगल के बीगचे के अलावा हंडिया के पास टेंट लगाकर बांस की टोकरी, पूप बनाने वाले बंजारों को प्रशासन ने कोरोना संक्रमण की वजह से एहतियातन हटा हिया है। धनुपुर ब्लाक के शुकलपुर गांव के बगीचे में भी तालाब के किनारे 20 से अधिक परिवार टेंट लगाकर रहते थे, लेकिन लॉकडाउन में अब उनका भी पता नहीं है। इनसेट जड़ीबूटी बेचकर गुजारा करने वाले शंकरगढ़ के घुमंतू परिवारों पर भी मुसीबत सराय अकिल (संवाद) प्रयागराज के शंकरगढ़ इलाके से आकर पिछले छह महीने से फकीराबाद चौराहे के पास डेरा डाले घुमंतू समुदाय के परिवारों के सामने लॉकडाउन में रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। बंजारा समुदाय के ये लोग जड़ी-बूटी बेचकर परिवार का खर्च चलाते थे। इस परिवार के मुखिया राजू व गोविंद ने बताया कि लॉकडाउन के बाद काम-धंधा बंद होने से रोटी के लाले पड़ गए हैं। पहले तो कोई न कोई भोजन या राशन दे देता था, लेकिन अब पेट पालने के लिए हाथ फैलाना पड़ रहा है। उनके मुताबिक उन्हें न तो सरकार की ओर से आर्थिक मदद के रूप में एक हजार रुपया मिला और न ही राशन कार्ड बना। जिले में इस तरह के सैकड़ों परिवार दर-दर भटकने के लिए मजबूर हो गए हैं।
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