UP : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- बहाल किए गए कर्मचारियों पर ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ सिद्धांत लागू नहीं होगा
कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक, देवरिया की ओर से पारित आदेश को रद्द करते हुए याची को उक्त अवधि के लिए पूर्ण वेतन और भत्ते के साथ-साथ छह प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज और याचिका की लागत के रूप में 25 हजार रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बर्खास्तगी या निष्कासन के आदेश को रद्द करने के बाद बहाली पर कर्मचारियों को उस अवधि के लिए पूरे वेतन और भत्ते से वंचित नहीं किया जा सकता है, जब तक वह सेवा में नहीं था। ऐसी स्थिति में ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ का सिद्धांत लागू नहीं होता है।
यह आदेश न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय की एकलपीठ ने याची दिनेश प्रसाद की याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। याची उत्तर प्रदेश पुलिस में अनुचर (फॉलोवर) के रूप में कार्यरत था। उत्तर प्रदेश पुलिस अधीनस्थ अधिकारी (दंड एवं अपील) नियम 1991 के नियम 14 के तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही के बाद उन्हें अपने अधिकारियों को सूचित किए बिना तथा अनुमोदित अवकाश के बिना ड्यूटी से अनुपस्थित रहने के आरोप में 9 जनवरी 2020 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
हालांकि, उनकी अपील को पुलिस उपमहानिरीक्षक, गोरखपुर परिक्षेत्र ने स्वीकार कर लिया और उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर 29 सितंबर 2020 को पुनः सेवा में बहाल कर दिया गया। इसके बाद पुलिस अधीक्षक, देवरिया ने 18 जनवरी 2024 को याची को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया, जिसके बाद उन्हें ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ सिद्धांत के आधार पर बर्खास्तगी की अवधि का वेतन भुगतान नहीं किया गया।
इसके खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा सरकार यह साबित करने ने विफल रही है कि सेवा से बाहर रहने की अवधि में वह किसी और रोजगार के जरिए जीविकोपार्जन कर रहा था। लिहाजा, याची उस अवधि के लिए पूर्ण वेतन और भत्ते का हकदार है।
कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक, देवरिया की ओर से पारित आदेश को रद्द करते हुए याची को उक्त अवधि के लिए पूर्ण वेतन और भत्ते के साथ-साथ छह प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज और याचिका की लागत के रूप में 25 हजार रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है।