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इस ‘फकीर’ के ज्ञान के आगे नतमस्तक था हर कोई

Wed, 01 Mar 2017 01:50 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Wed, 01 Mar 2017 01:50 AM IST
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The 'Mystic' knowledge was let down by everyone
इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
प्रोफेसर अमर सिंह के साथ ही बोलचाल और श्रोता परंपरा के एक युग का अवसान हो गया। शिक्षा हो या साहित्य जगत या फिर शहर के स्याह हो चुके पन्नों को पलटने की बात प्रोफेसर सिंह का ही नाम हर किसी की जुबां पर होता। इस ‘इनसाइक्लोपीडिया’ का कोई सानी नहीं था। साहित्य गोष्ठी हो या नाट्य मंच उनके बिना अधूरा सा लगता। बकौल प्रोफेसर आरके सिंह (उनके शिष्य इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष), ‘उनकी क्लास में पढ़ाई की शुरुआत तो विषय वस्तु से होती लेकिन एक के बाद एक कड़ियां जुड़ती जातीं और क्लास खत्म होने के बाद विद्यार्थियों के पास ज्ञान का पूरा भंडार होता। वह भी ऐसा ज्ञान, जो शायद अध्ययन के दम पर नहीं बटोरा जा सकता था।’ तभी तो ज्ञानी लोग उन्हें चलता फिरता ज्ञान कोश कहते हैं और रायबरेली में अवध के तालुकदार परिवार में जन्मे इस ‘फकीर’ के आगे हर कोई झुकता था।
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर अमर सिंह की तो कोई रचना नहीं है लेकिन उन्होंने जो बोला उसे लिखकर कई लोग विद्वानाें की श्रेणी में शामिल हो गए। उनका बोला हुआ हर वाक्य आधार स्तंभ बन गया, जिसे उन्होंने साक्ष्यों की मदद से खुद ही अकाट्य बनाया। वर्षों पुरानी स्मृतियों को अक्षरश: प्रस्तुत करने की उनमें अद्भूत शक्ति थी। प्रोफेसर सिंह ने बोलकर कितने लोगों को साहित्यकारों और विद्वानों की परंपरा में आगे बढ़ाया इसका अनुमान अंग्रेजी विभाग को देखकर ही लगाया जा सकता है।
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विभाग में इस समय 19 अध्यापक हैं और विभागाध्यक्ष समेत 12 लोग उनके शिष्य हैं। साहित्य ही नहीं, रंगमंच, विज्ञान, पर्यावरण, गंगा सब पर उनकी समान पकड़ थी। इतना ही नहीं जानवरों, पक्षियों के बारे में भी वह समान रूप से जानकारी रखते थे। उनके इस ज्ञान की ख्याति भी थी और इलाहाबादी परंपरा और स्मृतियों को साझा करने की बात हो तो लोग इतिहास को पन्नों को पलटने के बजाय टैगोर टाउन स्थित उनके आवास की ओर रुख करते। सिर्फ इलाहाबाद के बारे में ही नहीं कई अन्य जिलाें का इतिहास भी उनकी मेमोरी में सुरक्षित रहा। उनके शिष्य विश्वविद्यालय के मध्यकालीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर हेरंब चतुर्वेदी बताते हैं, ‘एक बार मैंने उनसे पूछ लिया कि लहुरावीर और भोजुवीर (वाराणसी के दो मोहल्ले) नाम क्यों पड़े?
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इतना पूछना था कि कुछ मिनटों में उन्होंने उन मोहल्लों के साथ पूरे बनारस के इतिहास को सामने रख दिया।’ इस तरह के कई संस्मरण हैं। प्रोफेसर सिंह आल इंडिया रेडियो से भी वर्र्षो जुड़े रहे और ‘बच्चों की कहानियां’ कार्यक्रम में शामिल होते थे। यही कारण रहा कि विश्वविद्यालय की शैक्षिक एवं साहित्यिक गतिविधियां ही नहीं, हिन्दुस्तानी एकेडमी, विज्ञान परिषद, संग्रहालय, प्रयाग संगीत समिति आदि संस्थाओं के कार्यक्रमों में भी उनका अलग स्थान रहा। उनके बिना गोष्ठी, व्याख्यान अधूरी मानी जाती।

प्रोफेसर आरके सिंह बताते हैं, ‘गुरुजी शिक्षक और मार्गदर्शक के साथ शिकारी एवं निशानेबाज भी थे। उनकी निशानेबाजी के अच्छे-अच्छे लोग लोहा मानते थे।’ प्रोफेसर अमर सिंह की स्मृतियों को साझा करते हुए प्रोफेसर आरके सिंह भावुक हो जाते हैं । वह बताते हैं, उनका पूरा जीवन ही प्रेरणा देने वाला रहा। सादा जीवन उच्च विचार के जीता जागता उदाहरण रहे। पुरानी फिएट खराब हो गई लेकिन बेची नहीं। वही नीम का पेड़, चारपाई पर बैठना और चौपाल लगाना लेकिन व्यक्तित्व ऐसा कि फटे कपड़े में भी हों तब भी बड़े से बड़े लोग उनके आगे नतमस्तक होते। प्रोफेसर अमर सिंह के व्यक्तित्व के प्रेरणा देने वाले अनेक ऐसे पहलू हैं जिन्हें शब्दाें में बांधा जाना संभव नहीं है लेकिन इस काबिलियत के दम पर सभी को नतमस्तक करने वाला यह ‘फकीर’ इन स्मृतियों को छोड़कर सबको अलविदा कह चुका है।

प्रोफेसर अमर सिंह का जन्म 1932 में रायबरेली के तालुकदार परिवार में हुआ था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल कर वह यहीं पर 1955 में अध्यापन कार्य से जुड़ गए। वह 1993 में रिटायर हुए। इस दौरान विश्वविद्यालय में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे। 1986 में वह विश्वविद्यालय संघ के अध्यक्ष रहे। चीफ प्रॉक्टर की जिम्मेदारी संभालने के साथ उन्होंने छात्रसंघ चुनाव भी कराया। जीएन झा हॉस्टल का वार्डेन थे तो एक अजिबो-गरीब घटना हुई।

एक छात्र गायब हो गया। अन्य अंत:वासियों ने ऐसे साक्ष्य दिखाए कि जैसे उसकी हत्या कर दी गई हो लेकिन प्रोफेसर अमर सिंह इस बात अडिग रहे कि छात्र की मौत नहीं हुई है। सभी साक्ष्य बनावटी हैं। अंत में वही सच हुए और छात्र कुछ दिनों में वापस आ गया। सेवानिवृत्ति के बाद प्रोफेसर अमर सिंह उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग में सदस्य भी रहे। वह वाराणसी के यूपी कालेज के प्रबंधक भी रहे। इनके अलावा वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अलावा कई अन्य संस्थाओं में भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे। प्रोफेसर अमर सिंह की पत्नी का कुछ महीने पहले ही निधन हुआ था। उनके कोई संतान नहीं थी। भाई की तीन बेटियां साथ ही रहती थीं।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में अध्यापक रहे प्रोफेसर अमर सिंह के निधन से शिक्षकों और साहित्यकारों में गहरा शोक व्याप्त है। विभिन्न संस्थाओं की शोक सभा में वक्ताओं ने उनके निधन को बड़ी क्षति बताया।विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में मंगलवार को शोक सभा आयोजित कर प्रोफेसर सिंह के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की गई। शोक प्रकट करने वालों में अध्यापक, कर्मचारी और विद्यार्थी शामिल रहे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय अध्यापक संघ की ओर से भी सभा कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। संस्कृत विभाग में हुई सभा में संघ के अध्यक्ष प्रोफेसर रामसेवक दुबे, पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर रामकिशोर शास्त्री, प्रोफेसर शंकर दयाल द्विवेदी, प्रोफेसर कौशल किशोर श्रीवास्तव, प्रोफेसर एआर सिद्दीकी, प्रोफेसर शिवप्रसाद, प्रोफेसर लालसा यादव, डॉ.सूर्य नारायण सिंह आदि शामिल रहे।

हिन्दुस्तानी एकेडमी में आयोजित सभा में वक्ताओं ने शोक प्रकट किया। उन्होंने प्रोफेसर अमर सिंह के व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। एकेडमी के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ.सुनील जोगी, सचिव नरेंद्र प्रताप सिंह ने भी फोन से शोक प्रकट किया। कोषाध्यक्ष रविनंदन सिंह ने उनके निधन को एकेडमी और साहित्य जगत के लिए अपूर्णनीय क्षति बताया। शोक सभा में हरिमोहन मालवीय, बुद्धिसेन शर्मा, नरेश कुमार गौड, नंदल हितैषी, डॉ.अनुपम आनंद आदि शामिल रहे।

‘विश्वविद्यालय और अन्य संस्थाओं में प्रोफेसर अमर सिंह की सेवाएं अविस्मरणीय रहेंगी। उनके निधन से विश्वविद्यालय और शिक्षा जगत ने एक महान विद्वान खो दिया।’
प्रो.रामसेवक दुबे, अध्यक्ष-इविवि अध्यापक संघ

‘प्रोफेसर अमर सिंह का निधन बहुत दुखद है। वह सभी विषयों के अच्छे जानकार एंव विद्वान थे। उनका सानिध्य एवं स्नेह हम सबको प्राप्त था। वह छात्रों एवं युवाओं के प्रेरणा स्रोत रहे। आज हममें से अनेको लोगों ने अपना अभिभावक खो दिया।’
डॉ.नरेंद्र सिंह गौर, पूर्व शिक्षामंत्री

‘प्रकृति की इस निष्ठुरता पर कुछ कहते नहीं बन रहा है। इलाहाबाद का प्रकाश स्तम्भ, एक ज्ञानपुंज, चलता फिरता पुस्तकालय अब हम लोगों से रूबरू नहीं मिल पाएगा, सहसा विश्वास नहीं हो रहा है। वो इलाहाबाद के चमकदार रत्नों में अलग स्थान रखते हैं। उनके व्यक्तित्व में ओजपूर्ण आकर्षण था, श्रद्धा और प्रेम की सजीव मूर्ति थे। विनम्र श्रद्धांजलि।’
रविनंदन सिंह, कोषाध्यक्ष- हिन्दुस्तानी एकेडमी

‘अमरता का संबंध शरीर से नहीं सोच, दृष्टि और योगदान से होता है और होता रहेगा और आज यह बात पुन: सिद्ध होती है प्रोफेसर अमर सिंह के देहावसान पर। प्रोफेसर अमर सिंह सिर्फ एक नाम भर नहीं थे बल्कि इलाहाबाद के साहित्यिक और वैचारिक पक्ष के अग्रणी प्रतिनिधि थे।’

श्लेष गौतम, कवि
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‘बहुत दुखद। स्नातक में वह मेरे अध्यापक रहे। वह विषय से इतर भी कमांड रखते थे। प्रोफेसर अमर सिंह के निधन से शिक्षा और साहित्य को अपूर्णीय क्षति हुई है।’
असरार गांधी

‘दादा एक ऐसा शून्य कर गए हैं जिसकी भरपाई असंभव है। बहुतों ने मार्गदर्शक और अभिभावक खो दिया है। ’
अनुपम परिहार
 
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