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कुंभ की आखिरी डुबकी,चहुंदिश उत्सव
Tue, 05 Mar 2019 12:20 AM IST
विनोद सिंह
अनूप ओझा, अमर उजाला, प्रयागराज
अनूप ओझा, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Tue, 05 Mar 2019 12:20 AM IST
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एक ओर आस्था की लहरें उठीं, दूसरी ओर प्रवासी पक्षियों केकिलोल संग नावों के झुंड इतराए। महाशिवरात्रि पर कुंभ के आखिरी स्नान पर्व की विदाई बेला अरुणोदय की लालिमा फूटने के साथ ऐसे की मनोरम दृश्यों को लेकर चौतरफा छा गई। पौ फटने के साथ पवित्र संगम पर स्वर्णमयी किरणों की रेखा आरपार तैरती रही और घाटों पर पूजा-आरती ध्यान से श्रद्धा-विश्वास का खजाना खुलता रहा। जन प्रवाह के बीच कहीं शंखध्वनि गूंजती रही तो, कहीं दशांग-धूप की सुगंध से से त्रिवेणी का तट महकता रहा। कोई जीवन के विकारों से मुक्ति की कामना कर रहा था तो कोई सुख-समृद्धि की। किसी ने संतान की चाह लेकर अर्घ्य दिया तो किसी ने बिटिया के लिए योग्य घर-वर की कामना से दीप जलाए। कुंभ के आखिरी स्नान पर्व महाशिवरात्रि पर डुबकी के साथ मनौतियों की मनुहार कुछ ऐसी ही थी।
महाशिवरात्रि पर स्नान-दान-पुण्य का अद्भुत संगम देखने लायक था। न कोई परदा न दीवार। असंख्य लोग एक साथ संगम पर अमृत रूपी कुंभ में जीवन धन्य बना रहे थे। सास,ससुर, जेठ के साथ बहू-बेटियों, ननद-देवरानियों की डुबकी बिना किसी संकोच के लगती रही। कोई गमछा तान कर खड़ा था तो कहीं परिवार की महिलाएं साड़ी का परदा बनाकर एक दूसरे को ढंकते हुए स्नान करके निकलती रहीं। रेती पर बिछे पुआल के बीच जगह-जगह ध्यानमग्न नाक दबाए, माला जपते साधु-संतों के भी समूह आस्था के संगम में हर किसी के लिए आकर्षण का केंद्र बने थे। कोई दादी को लेकर पहुंचा, तो कोई माता-पिता का सहारा बनकर डुबकी लगवाने आया था।
ग्वालियर से बूढ़ी मां श्रीदेवी को लेकर पुत्र राहुल और बहू माधुरी पहुंचे थे। इसी भीड़ में उल्लास, उत्साह भी था और बिछड़ने वालों की आंखों में आंसू भी। संगम नोज पर दिल्ली से परिवार के साथ आईं सुनयना डुबकी लगाने के बाद अपनों से बिछड़ गईं। वह एक हाथ में कपड़े लेकर इधर-उधर अपनी पुत्री को ढूंढती रहीं। उधर, बेटी भी मां से मिलने के लिए बिलखती रही। वहां मौजूद कुंभ सेवा मित्रों ने फोन नंबर से संपर्क कर कुछ देर बाद मां-बेटी को मिलवाया तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू छलकने लगे। माघी पूर्णिमा पर हर तरफ ऐसा ही दृश्य था।
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मकर संकांति से लेकर महाशिवरात्रि तक संगम में 24.05 करोड़ श्रद्धालुओं ने पुण्य की डुबकी लगाई। यह आंकड़ा सोमवार को कुंभ मेला प्रशासन ने जारी किया। इसी के साथ डुबकी लगाने का रिकार्ड तो कायम हुआ ही, सुरक्षित कुंभ की भी परिकल्पना साकार हुई। अरैल घाट, संगम नोज, किला घाट, सरस्वती घाट, नागवासुकी घाट, शास्त्री ब्रिज सहित अन्य घाटों पर स्नानार्थियों की भीड़ को वालेंटियर्स और पुलिस के जवानों ने संभाला। सहयोग के भावों का दृश्य खुशी और प्रेम से ओतप्रोत कर देने वाला था।
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महाशिवरात्रि पर स्नान-दान-पुण्य का अद्भुत संगम देखने लायक था। न कोई परदा न दीवार। असंख्य लोग एक साथ संगम पर अमृत रूपी कुंभ में जीवन धन्य बना रहे थे। सास,ससुर, जेठ के साथ बहू-बेटियों, ननद-देवरानियों की डुबकी बिना किसी संकोच के लगती रही। कोई गमछा तान कर खड़ा था तो कहीं परिवार की महिलाएं साड़ी का परदा बनाकर एक दूसरे को ढंकते हुए स्नान करके निकलती रहीं। रेती पर बिछे पुआल के बीच जगह-जगह ध्यानमग्न नाक दबाए, माला जपते साधु-संतों के भी समूह आस्था के संगम में हर किसी के लिए आकर्षण का केंद्र बने थे। कोई दादी को लेकर पहुंचा, तो कोई माता-पिता का सहारा बनकर डुबकी लगवाने आया था।
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ग्वालियर से बूढ़ी मां श्रीदेवी को लेकर पुत्र राहुल और बहू माधुरी पहुंचे थे। इसी भीड़ में उल्लास, उत्साह भी था और बिछड़ने वालों की आंखों में आंसू भी। संगम नोज पर दिल्ली से परिवार के साथ आईं सुनयना डुबकी लगाने के बाद अपनों से बिछड़ गईं। वह एक हाथ में कपड़े लेकर इधर-उधर अपनी पुत्री को ढूंढती रहीं। उधर, बेटी भी मां से मिलने के लिए बिलखती रही। वहां मौजूद कुंभ सेवा मित्रों ने फोन नंबर से संपर्क कर कुछ देर बाद मां-बेटी को मिलवाया तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू छलकने लगे। माघी पूर्णिमा पर हर तरफ ऐसा ही दृश्य था।
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मकर संकांति से लेकर महाशिवरात्रि तक संगम में 24.05 करोड़ श्रद्धालुओं ने पुण्य की डुबकी लगाई। यह आंकड़ा सोमवार को कुंभ मेला प्रशासन ने जारी किया। इसी के साथ डुबकी लगाने का रिकार्ड तो कायम हुआ ही, सुरक्षित कुंभ की भी परिकल्पना साकार हुई। अरैल घाट, संगम नोज, किला घाट, सरस्वती घाट, नागवासुकी घाट, शास्त्री ब्रिज सहित अन्य घाटों पर स्नानार्थियों की भीड़ को वालेंटियर्स और पुलिस के जवानों ने संभाला। सहयोग के भावों का दृश्य खुशी और प्रेम से ओतप्रोत कर देने वाला था।