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विश्व नदी दिवस : नकारा न जाए नदियों काअस्तित्व, सरकारी रिकॉर्ड में हो दर्ज

Sun, 25 Sep 2022 12:44 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 25 Sep 2022 12:44 AM IST
सार

बकुलाही नदी को पुनर्जीवन देने वाले सामाजिक कार्यकर्ता समाज शेखर ने सर्वोच्च न्यायालय की ओर से नदियों को जीवित प्राणी मानने को सकारात्मक पहल बताया। कहा, नदी संरक्षण के लिए व्यावहारिक स्तर पर जुटना होगा।

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The existence of rivers should not be denied, it should be recorded in government records
Prayagraj News : नदी दिवस पर आयोजित संगोष्ठी में उपस्थित जलयोद्धा। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

विश्व नदी दिवस की पूर्व संध्या पर शनिवार को अमर उजाला संवाद में जुटे जलयोद्धाओं ने कहा कि नदियों के अस्तित्व को नकारा न जाए। उन्हें सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए। सबने नदियों के संरक्षण के लिए प्रतिबद्धता भी जताई। विषय प्रवर्तन करते हुए छोटी नदियां बचाओ अभियान के अध्यक्ष ब्रजेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि नदियों के अस्तित्व को नकारने के बजाय उन्हें सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए। प्राइमरी स्तर से ही बच्चों को जलकथाएं पढ़ाई जाएं, ताकि वे नदियों के संरक्षण के प्रति जागरूक हो सकें। इसी तरह गंगा विश्वविद्यालय की स्थापना की पहल भी हो।

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बकुलाही नदी को पुनर्जीवन देने वाले सामाजिक कार्यकर्ता समाज शेखर ने सर्वोच्च न्यायालय की ओर से नदियों को जीवित प्राणी मानने को सकारात्मक पहल बताया। कहा, नदी संरक्षण के लिए व्यावहारिक स्तर पर जुटना होगा। उन्होंने स्थानीय समाज और जनसहयोग से मनसइता या लपरी, किसी एक नदी के पुनरुद्धर का संकल्प भी लिया।
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गंगा सेवा मंच के अध्यक्ष और सीएमपी डिग्री कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. प्रमोद शर्मा ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया कि जिन अफसरों को गंगा संरक्षण से जुड़े कार्यों की जिम्मेदारी दी जा रही है, उन्हें गंगा के ही बारे कोई जानकारी नहीं होती। इससे योजनाएं सफल नहीं हो पाती हैं। जरूरी है कि नदियों में न्यूनतम प्रवाह बना रहे।
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शैलेंद्र राय ने जलवायु परिवर्तन पर चर्चा की। कहा, नदियों से ज्यादा से ज्यादा गाद निकाली जानी चाहिए तभी उनमें प्रवाह बना रहेगा। इविवि के पर्यावरण विज्ञान केंद्र के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुरनजीत प्रसाद ने कहा, तकनीकी उपायों से नदियों को प्रदूषणमुक्त करना संभव है। इसके लिए अधिक से अधिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाएं।


नमामि गंगे परियोजना की जिला कार्यक्रम अधिकारी ऐषा सिंह ने नदियों विशेषकर गंगा से डॉल्फिन, कछुओं के गुम या कम होने पर चिंता जताई। कहा, नदियां प्रदूषणमुक्त होंगी, तभी इन जीवों का जीवन बचेगा। नदियों को प्रदूषित न किया जाए तो उनमें स्वयंशोधन की क्षमता है। राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (नासी) के डॉ. संतोष कुमार बोले, नदियां हमारी सभ्यता का आधार रही हैं। 16 में से 12 संस्कार नदियों के किनारे ही होते हैं। तकनीक के बिना नदियों को प्रदूषणमुक्त करना संभव नहीं है।


आईईआरटी के असिस्टेंट प्रोफेसर विवेक बरनवाल ने कहा कि जिस जलाशय का पानी पीने योग्य हो, उसे ही साफ माना जा सकता है। प्रदूषणमुक्ति के बारे में विद्यार्थियों को और प्रभावी तरीके से जागरूक करना होगा। आईईआरटी के ही असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुनील तिवारी ने जोड़ा, प्रदूषणमुक्ति के लिए प्रभावी तकनीक के साथ जनचेतना जरूरी है। वहीं, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी आरके सिंह ने दावा किया कि बोर्ड बेहतर तरीके से मॉनीटरिंग कर रहा है, लेकिन अविरलता बढ़ने से ही निर्मलता का प्रतिशत बढ़ेगा।



गंगा पर बने कानून को मिले सदन से मान्यता
हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और एमिकस क्यूरी अरुण गुप्ता ने कहा कि नदियों की निर्मलता के लिए अविरलता जरूरी है। शोधों के बाद गंगाजल की गुणवत्ता दुनिया मान चुकी है, लेकिन आईसीएमआर जैसे केंद्र अब भी बॉयोडायवर्सिटी पर शोध कराने से कतराते हैं। निर्मल गंगा के लिए जरूरी है कि गंगा पर प्रस्तावित कानून संसद पारित करे। साथ ही, विश्वविद्यालय स्तर पर ‘रिवर इंजीनियरिंग’ की पढ़ाई भी कराई जाए।

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