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लोक दायित्व व व्यक्तिगत दायित्व के बीच विभाजन रेखा पतली : हाईकोर्ट

Tue, 12 Oct 2021 10:28 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क Published by: विनोद सिंह Updated Tue, 12 Oct 2021 10:28 PM IST
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The dividing line between public responsibility and personal responsibility is thin: High Court
allahabad highcourt - फोटो : social media
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजों की पूर्ण पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि लोक दायित्व व व्यक्तिगत दायित्व के बीच विभाजन की एक पतली रेखा है, जिसका निर्धारण कार्य की प्रकृति पर निर्भर करेगा। लोक व व्यक्तिगत कार्य की कसौटी के लिए दो तत्व जरूरी हैं। पहला व्यक्ति या प्राधिकारी लोक कर्तव्य या कार्य कर रहे हों।
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दूसरा कार्य लोक कानून के दायरे में किया जा रहा हो, न कि सामान्य कानून के। कोई कानूनी प्राधिकारी है, इतने भर से उसके खिलाफ याचिका पोषणीय नहीं हो जाती। इसी तरह पक्षों के बीच संविदा मामले में भी याचिका  नहीं की जा सकती, भले ही वे सरकारी प्राधिकारी हों। याचिका तभी पोषणीय होगी, जब लोक कानून के तहत लोक कार्य या दायित्व निभाया जा रहा हो। 
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यह निर्णय कार्यवाहक मुख्य न्यायमूर्ति एमएन भंडारी, न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया तथा न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह की तीन सदस्यीय पूर्णपीठ ने उत्तम चंद रावत की याचिका पर संदर्भित विधि प्रश्न का निवारण करते हुए दिया है। पूर्ण पीठ के समक्ष विधि प्रश्न था कि प्राइवेट शिक्षण संस्थान लोक दायित्व निभाते हुए राज्य के कार्य कर रहे हैं और उनके खिलाफ याचिका दायर की जा सकती है या नहीं ?
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इस फैसले के साथ पूर्णपीठ ने प्रकरण एकल पीठ को निर्णय के लिए वापस भेज दिया है। एकल पीठ ने विभिन्न न्यायिक फैसलों में मतभिन्नता को लेकर विधि प्रश्न पूर्णपीठ को फैसले के लिए भेजा था। सवाल था कि शिक्षा देने का राज्य के कार्य करने वाले प्राइवेट कॉलेजों के खिलाफ याचिका पोषणीय है या नहीं।


इस मुद्दे पर विरोधाभासी फैसले थे

शिक्षा देना सरकार का दायित्व है और प्राइवेट कॉलेज राज्य का दायित्व निभा रहे हैं। यह लोक दायित्व है। पूर्ण पीठ ने सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के तमाम फैसलों का परिशीलन करके कहा कि याचिका सरकारी व प्राइवेट संस्था के खिलाफ दायर हो सकती है, शर्त यह होगी कि उसके कार्य की प्रकृति क्या है।


यदि पब्लिक कानून के तहत लोक कार्य है तो याचिका दायर हो सकती है। यदि लोक कार्य है किंतु सामान्य कानून के तहत कार्य किया जा रहा है तो याचिका पोषणीय नहीं है।
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