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पति-पत्नी राजी तो सरकार को क्या है परेशानी
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sat, 17 Sep 2016 02:28 AM IST
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सुखना लेक को लेकर पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देश
- फोटो : फाइल फोटो
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इलाहाबाद। पति-पत्नी के आपस में सुलह हो जाने और पति के मुकदमे से बरी हो जाने के बाद भी निचली अदालत के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देना प्रदेश सरकार को भारी पड़ गया। हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए बेवजह की मुकदमेबाजी को बढ़ावा देने पर एक लाख रुपये का हर्जाना लगा दिया है। हर्जाने की राशि हाईकोर्ट में जमा करनी होगी। प्रदेश सरकार की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति एसके गुप्ता और न्यायमूर्ति शशिकांत पीठ ने यह आदेश दिया।
मामला गोरखपुर के झागा थाने का है। यहां के मनोज विश्वकर्मा की पत्नी ने उसके खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कराया। लड़की के माता-पिता इसमें गवाह थे। निचली अदालत मेें दोनों अपने बयान से मुकर गए। साक्ष्य के अभाव में अदालत ने मनोज को बरी कर दिया। पता चला कि पति-पत्नी के बीच सुलह हो जाने के कारण माता-पिता ने गवाही नहीं दी। अब दोनों साथ रह रहे हैं। इसके बावजूद प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर निचली अदालत के फैसले को चुनौती दे दी।
कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि अपील बिना विवेक का इस्तेमाल किए दाखिल की गई है। जब पीड़िता ने कोई शिकायत नहीं की तो सरकार को अपील दाखिल करने की क्या आवश्यकता थी। पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि इस प्रकार की फिजूल की मुकदमेबाजी से न सिर्फ सरकार का धन व्यय होता है बल्कि अदालतों पर भी अनावश्यक बोझ पड़ता है। इसकी वजह से आवश्यक मुकदमों की सुनवाई नहीं हो पाती है। यह एक प्रकार से न्याय रथ के पहिये को रोकना है। इस प्रकार की लापरवाही करने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यदि सरकार चाहे तो हर्जाने की राशि अधिकारियों के वेतन से वसूल सकती है।
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मामला गोरखपुर के झागा थाने का है। यहां के मनोज विश्वकर्मा की पत्नी ने उसके खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कराया। लड़की के माता-पिता इसमें गवाह थे। निचली अदालत मेें दोनों अपने बयान से मुकर गए। साक्ष्य के अभाव में अदालत ने मनोज को बरी कर दिया। पता चला कि पति-पत्नी के बीच सुलह हो जाने के कारण माता-पिता ने गवाही नहीं दी। अब दोनों साथ रह रहे हैं। इसके बावजूद प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल कर निचली अदालत के फैसले को चुनौती दे दी।
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कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि अपील बिना विवेक का इस्तेमाल किए दाखिल की गई है। जब पीड़िता ने कोई शिकायत नहीं की तो सरकार को अपील दाखिल करने की क्या आवश्यकता थी। पीठ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि इस प्रकार की फिजूल की मुकदमेबाजी से न सिर्फ सरकार का धन व्यय होता है बल्कि अदालतों पर भी अनावश्यक बोझ पड़ता है। इसकी वजह से आवश्यक मुकदमों की सुनवाई नहीं हो पाती है। यह एक प्रकार से न्याय रथ के पहिये को रोकना है। इस प्रकार की लापरवाही करने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यदि सरकार चाहे तो हर्जाने की राशि अधिकारियों के वेतन से वसूल सकती है।
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