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Prayagraj News: लावारिस शवों पर बिखरा सिस्टम, भटक रहे परिजन
Sat, 25 Jul 2026 02:26 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
संवाद न्यूज एजेंसी, प्रयागराज
Updated Sat, 25 Jul 2026 02:26 AM IST
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लावारिस शवों की पहचान की व्यवस्था सवालों के घेरे में है। कुछ ही दिनों के भीतर सामने आए दो मामलों ने यह साफ कर दिया कि थानों के बीच समन्वय, सूचना तंत्र और पहचान की प्रक्रिया आज भी गंभीर खामियों से जूझ रही है। नतीजतन अपनों की तलाश में परिजन दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
ताजा मामला औद्योगिक क्षेत्र के बेलवट निवासी कमला प्रसाद के 31 वर्षीय बेटे सोहन का है। 15 जुलाई को जसरा बाईपास पर सड़क हादसे में घायल होने के बाद उसकी मौत हो गई। पहचान न होने पर शव पोस्टमार्टम हाउस में लावारिस रख दिया गया। उधर, परिवार लगातार उसकी तलाश करता रहा। आठवें दिन मां गीता देवी ने थाने में कपड़ों और साइकिल के आधार पर बेटे की पहचान की। सवाल यह है कि यदि परिवार तलाश में था तो सूचना तंत्र उन्हें समय रहते शव तक क्यों नहीं पहुंचा सका।
इससे पहले नैनी में ही रहने वाले औता मेजा निवासी एलनगंज स्थित उच्च शिक्षा निदेशालय के कर्मचारी हरिओम का मामला भी सुर्खियों में रहा। परिजनों का आरोप है कि तीन दिन तक शव की पहचान नहीं हो सकी। शिकायतें अलग-अलग थानों तक पहुंचीं लेकिन समन्वय के अभाव में शव मोर्चरी में पड़ा रहा। आखिरकार पुलिस द्वारा दिखाए गए फोटो से बेटे ने पिता की पहचान की।
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शहर में हर महीने औसतन 80 से 90 लावारिस शव मिलने के आंकड़े बताते हैं कि यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था की नियमित चुनौती है। सवाल यह है कि जब थानों के बीच डिजिटल नेटवर्क, वायरलेस संचार और फोटो साझा करने जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, तब भी पहचान में कई-कई दिन क्यों लग रहे हैं?
डीसीपी सिटी बोले, जांच के बाद होगी कार्रवाई
डीसीपी सिटी मनीष शांडिल्य ने बताया कि दोनों मामलों की जांच कराई जा रही है। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या समन्वय में कमी सामने आती है तो कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि भविष्य में ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए सभी थानों को लावारिस शवों की पहचान और सूचना के त्वरित आदान-प्रदान के संबंध में आवश्यक निर्देश दिए गए हैं।
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ताजा मामला औद्योगिक क्षेत्र के बेलवट निवासी कमला प्रसाद के 31 वर्षीय बेटे सोहन का है। 15 जुलाई को जसरा बाईपास पर सड़क हादसे में घायल होने के बाद उसकी मौत हो गई। पहचान न होने पर शव पोस्टमार्टम हाउस में लावारिस रख दिया गया। उधर, परिवार लगातार उसकी तलाश करता रहा। आठवें दिन मां गीता देवी ने थाने में कपड़ों और साइकिल के आधार पर बेटे की पहचान की। सवाल यह है कि यदि परिवार तलाश में था तो सूचना तंत्र उन्हें समय रहते शव तक क्यों नहीं पहुंचा सका।
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इससे पहले नैनी में ही रहने वाले औता मेजा निवासी एलनगंज स्थित उच्च शिक्षा निदेशालय के कर्मचारी हरिओम का मामला भी सुर्खियों में रहा। परिजनों का आरोप है कि तीन दिन तक शव की पहचान नहीं हो सकी। शिकायतें अलग-अलग थानों तक पहुंचीं लेकिन समन्वय के अभाव में शव मोर्चरी में पड़ा रहा। आखिरकार पुलिस द्वारा दिखाए गए फोटो से बेटे ने पिता की पहचान की।
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शहर में हर महीने औसतन 80 से 90 लावारिस शव मिलने के आंकड़े बताते हैं कि यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि व्यवस्था की नियमित चुनौती है। सवाल यह है कि जब थानों के बीच डिजिटल नेटवर्क, वायरलेस संचार और फोटो साझा करने जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं, तब भी पहचान में कई-कई दिन क्यों लग रहे हैं?
डीसीपी सिटी बोले, जांच के बाद होगी कार्रवाई
डीसीपी सिटी मनीष शांडिल्य ने बताया कि दोनों मामलों की जांच कराई जा रही है। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या समन्वय में कमी सामने आती है तो कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि भविष्य में ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए सभी थानों को लावारिस शवों की पहचान और सूचना के त्वरित आदान-प्रदान के संबंध में आवश्यक निर्देश दिए गए हैं।