स्वामी अभेदानंद बोले : छात्रों के जीवन में प्रसन्नता उतनी ही महत्त्वपूर्ण जितनी शिक्षा, संघर्ष से पीछे न हटें
स्वामी अभेदानंद ने कहा कि यह अतिआवश्यक है कि मन को स्थिर करके उन बातों में लगाया जाए जो हमे प्रसन्नता प्रदान करें। चित्त स्थिर है तो हृदय में आनंद उठता है और यही प्रसन्नता का भाव देता है। दक्षिण अफ्रीका के डरबन में स्थित चिन्मया आश्रम में सेवाएं दे रहे स्वामी अभेदानंद गंगा गुरुकुलम स्कूल में सोमवार को बच्चों को तनाव रहित रहने के लिए आयोजित कार्यशाला में बोल रहे थे।
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गीता में कहा गया है कि अंतः करण की प्रसन्नता होने पर संपूर्ण दुखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में भली भांति स्थिर हो जाती है। मनुष्य के लिए प्रसन्नता अति आवश्यक है। प्रसन्नता मन की एक अवस्था है, जिससे जीवन के सतत रहने का अहसास होता है। यह संसार मायापूर्ण है और दुखों का सागर है।
अतः यह अतिआवश्यक है कि मन को स्थिर करके उन बातों में लगाया जाए जो हमे प्रसन्नता प्रदान करें। चित्त स्थिर है तो हृदय में आनंद उठता है और यही प्रसन्नता का भाव देता है। दक्षिण अफ्रीका के डरबन में स्थित चिन्मया आश्रम में सेवाएं दे रहे स्वामी अभेदानंद गंगा गुरुकुलम स्कूल में सोमवार को बच्चों को तनाव रहित रहने के लिए आयोजित कार्यशाला में बोल रहे थे।
स्वामीजी ने कहा कि छात्रों के लिए प्रसन्नता उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितना उसकी शिक्षा। क्योंकि एक प्रसन्नचित छात्र ही पूर्ण मनोयोग से शिक्षा ग्रहण कर सकता है। वर्तमान युग में यदि सबसे तनाव में कोई है तो वो हमारे छात्र हैं। एक दुखी, परेशान और तनावग्रस्त छात्र जीवन संघर्ष में हार जाता है। छात्र जीवन में प्रसन्नता के इसी महत्त्व को समझते हुए गंगा गुरुकुलम विद्यालय में सोमवार को एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। जिसका विषय था जीवन में प्रसन्न कैसे रहा जाए।
प्रसन्नचित्त व्यक्ति होता है आत्मविश्वासी
स्वामी अभेदानंद जी ने इस कार्यशाला में अपने प्रेरित वचनों से छात्रों को लाभान्वित किया। वर्तमान में स्वामी जी दक्षिण अफ्रीका के डरबन में स्थित चिन्मया मिशन में अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। स्वामी जी ने युवाओं के लिए एक पुस्तक की भी रचना की जिसका नाम ष्चिन्मय उद्घोष है। स्वामी अभेदानन्द जी द्वारा लिखित कई लेख भी प्रकाशित हुए हैं जो छात्रों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। विद्यालय की सचिव कृष्णा गुप्ता और विद्यालय के कोषाध्यक्ष रविन्द्र गुप्ता कार्यशाला में उपस्थित रहे। पतंजलि ऋषिकुल के प्रधानाचार्य नित्यानंद एवम चिन्मया मिशन के सदस्यों ने भी इस कार्यशाला में भाग लिया।
कार्यशाला का प्रारंभ दीप प्रज्वलन व संस्कृत में एक प्रेरणा गीत के साथ हुआ। इस कार्यशाला में कक्षा 11 व 12 के बच्चों ने भाग लिया। स्वामी जी ने कहा कि प्रसन्नचित व्यक्ति आत्मविश्वासी होता है। वह कर्म से विमुख नहीं होता। जीवन संघर्ष से घबराता नहीं है। यदि आप प्रसन्न नहीं रहना चाहते हैं तो कोई भी आपको प्रसन्न नहीं कर सकता। प्रसन्न रहना हमारे हाथ में है। कहा कि जैसे ईश्वर हर जगह है और ईश्वर प्रसन्नता प्रदान करते हैं तो प्रसन्नता हर जगह है।
अपने जीवन में प्रसन्नता के क्षण को पहचानो। मुश्किल में भी प्रसन्न रहने के अवसर खोजो। उन्होंने प्रसन्न रहने की विविध कार्य प्रणाली को भी समझाया। योग करना, ध्यान करना, सत्संग करना, मन को रचनात्मक कार्य में लगाना, श्रेष्ठ पुस्तकों का पठन, मन को संयमित रखना आदि। मात-पिता का आदर करो। उन्हें खुशी प्रदान करने का प्रयास करो। उन्होंने कहा सफलता ही खुशी नहीं और असफलता दुख नहीं है। प्रत्येक दिन अच्छा है। छात्रों ने स्वामी जी से अपने मन में उठ रही जिज्ञासाओं को शांत करने तथा प्रसन्नता विषय पर और जानकारी प्राप्त करने के लिए विविध प्रश्न पूछे। जिसका उत्तर भी स्वामी जी ने दिया।