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छात्रनेता को डीबार, ब्लैक लिस्ट करने का आदेश रद्द

Sat, 29 Jul 2017 01:58 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sat, 29 Jul 2017 01:58 AM IST
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Student denies order to black, blacklist order
इलाहाबाद विश्वविद्यालय - फोटो : Getty
हाईकोर्ट ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रनेता विक्रांत सिंह को ब्लैक लिस्ट और डीबार करने का आदेश रद्द कर दिया। छात्र के खिलाफ जांच विश्वविद्यालय परिसर के बजाए गेस्ट हाउस में की जाएगी। जांच से पूर्व छात्र को आरोपपत्र और उसके विरुद्ध उपलब्ध साक्ष्य देने होंगे। इसका जवाब देने के लिए उसे एक सप्ताह का समय दिया जाए। कोर्ट ने छात्र के लिए पीजी प्रवेश में एक सीट खाली रखने का भी आदेश दिया है, ताकि यदि वह निर्दोष साबित होता है तो पीजी में प्रवेश प्राप्त कर सके।
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कोर्ट ने परिसर में अनुशासन कायम रखने और जांच पूरी होने तक छात्र को परिसर में प्रवेश नहीं देने का निर्देश दिया है। विक्रांत सिंह की याचिका पर न्यायमूर्ति मनोज मिश्र ने सुनवाई की। कोर्ट ने कुलपति से कहा है कि विभिन्न विभागों के पांच प्रोफेसरों की जांच टीम गठित की जाए जो इस मामले की जांच करेगी। प्रोफेसरों की यह कमेटी जांच पूरी कर चार सप्ताह में कुलपति को रिपोर्ट देगी। कुलपति इस पर एक सप्ताह में निर्णय लेंगे। याची का पक्ष अधिवक्ता शैलेंद्र ने रखा। इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसर में फरवरी 2017 और सात जुलाई 2017 को छात्रों का बवाल हुआ था। उन पर परिसर का माहौल बिगाड़ने और शिक्षकोें से अभद्रता व मारपीट करने का आरोप है। पुलिस के हस्तक्षेप के बाद मामला शांत हुआ। कुलपति ने इस मामले की जांच के लिए निदेशक को अधिकृत किया था। जांच में विक्रांत सिंह को दोषी पाते हुए उसे डीबार और ब्लैक लिस्ट करने की कार्रवाई की गई।
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याचिका में कहा गया कि विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्रवाई एकतरफा और नियम विरुद्ध है। याची को जानबूझकर फंसाया गया है। दंड का निर्धारण करने से पूर्व याची को उसका पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया। विश्वविद्यालय प्रशासन की दलील थी कि अनुशासनात्मक बोर्ड का गठन नहीं होने से कुलपति को अनुशासनात्मक कार्रवाई करने अधिकार है। वह अपना यह अधिकार दूसरे अधिकारी को प्रत्यायोजित भी कर सकते हैं। कार्रवाई करने का निर्णय सही है मगर याची को सुनवाई का मौका नहीं दिया गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने सुनवाई परिसर से बाहर गेस्ट हाउस में करने की मांग की थी जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।
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