जयंती पर विशेष : मार्कण्डेय ने गांव में लिखी ‘गुलरा के बाबा’, दुष्यंत ने खुद टाइप कराई अमर कहानी
कथाकार मार्कण्डेय को हिंदी साहित्य के आकाश पर उनकी कहानी ‘गुलरा के बाबा’ से एक अलग पहचान मिली थी। दिलचस्प बात यह है कि कहानी पहली बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गंगानाथ झा छात्रावास में पढ़ी गई। सुनने वालों में थे दुष्यंत कुमार और कमलेश्वर।
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कथाकार मार्कण्डेय को हिंदी साहित्य के आकाश पर उनकी कहानी ‘गुलरा के बाबा’ से एक अलग पहचान मिली थी। दिलचस्प बात यह है कि कहानी पहली बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गंगानाथ झा छात्रावास में पढ़ी गई। सुनने वालों में थे दुष्यंत कुमार और कमलेश्वर। दुष्यंत कुमार तो इतने प्रभावित हुए कि पांडुलिपि लेकर खुद इसे टाइप कराने की जिम्मेदारी उठा ली।
उन्होंने प्रसिद्ध पत्रिका में प्रकाशित करवाने के लिए कहानी को भिजवा दिया। लगभग इसी कालखंड में कमलेश्वर और मोहन राकेश के साथ मार्कण्डेय नई कहानी के पुरोधा के रूप में स्थापित हो गए थे। कथाकार मार्कण्डेय की जन्म जयंती (2 मई) के अवसर पर साहित्यकार रविनंदन सिंह ने दुष्यंत कुमार के साथ उनकी दोस्ती और प्रसिद्ध कथाओं के पीछे की कहानियां साझा की हैं।
मार्कण्डेय जब 1942 में 12वीं में पढ़ रहे थे तब गांधीजी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था। मार्कण्डेय ने अपनी साहित्यिक यात्रा का उल्लेख करते हुए पत्रिका कथा के एक अंक में लिखा था, उन दिनों मैं गांव में था। एक महिला का इकलौता जवान लड़का 1942 के आंदोलन में बलिदान हो गया। गर्मी की छुट्टियों में कॉलेज से जौनपुर अपने घर गया तो उस बूढ़ी स्त्री से मिलकर उदास हो गया। इस तनाव में मैंने एक कहानी शहीद की मां लिख दी। दूसरे हफ्ते ही वह कहानी एक प्रतिष्ठित अखबार में छप गई। यहीं से कहानी लेखन का सिलसिला शुरू हुआ जो फिर कभी नहीं रुका।
मार्कण्डेय का जन्म 2 मई 1930 को जौनपुर के बराई नामक गांव के एक किसान परिवार में हुआ था। कई विद्वान उनकी जन्मतिथि 5 मई भी मानते हैं। प्रयागराज में बीए करने के दौरान कमलेश्वर और दुष्यंत कुमार संग उनकी तिकड़ी बहुत प्रसिद्ध थी, जिसे समकालीनों ने त्रिशूल नाम दिया था। उन्होंने वर्ष 1948 से हिंदी साहित्य में एमए किया।
पत्रिका बरगद के एक अंक में उन्होंने लिखा था, मुझे अच्छी तरह याद आता है कि एक बार गर्मियों की छुट्टी के बाद मैं गांव से गुलरा के बाबा नाम की कहानी लिख कर लाया था। मैंने सबसे पहले उसे दुष्यंत और कमलेश्वर को गंगानाथ झा छात्रावास में पढ़कर सुनाया। दुष्यंत को रचनाओं की गहरी समझ थी। खुद तो वह कथा-साहित्य नहीं लिखते थे लेकिन किसी कमजोर कहानी को पकड़ लेने में उन जैसा सिद्धहस्त कोई दूसरा नहीं देखा।
मुझे याद है कि गुलरा के बाबा कहानी सुनकर वह इतना प्रसन्न हुए थे कि मूल पांडुलिपि लेकर उसे टाइप कराने खुद चले गए। कमलेश्वर और दुष्यंत दोनों डेलीगेसी के छात्र थे। दोनों विश्वविद्यालय गंगानाथ झा छात्रावास आते थे, जहां के मार्कण्डेय अत:वासी थे।
मार्कण्डेय का रचना संसार
उपन्यास : अग्निबीज तथा सेमल के फूल
कहानी-संग्रह : पान फूल, महुए का पेड़, हंसा जाई, अकेला, भूदान, माही, सहज और शुभ, बीच के लोग उल्लेखनीय है।
कविता संग्रह : सपने तुम्हारे थे,
एकांकी संग्रह : पत्थर और परछाइयां तथा आलोचना पुस्तक कहानी की बात अत्यंत प्रसिद्ध हुए।