AU : कंकाल व पत्थर बताएंगे मानव सभ्यता का क्रमबद्ध विकास, प्राचीन इतिहास विभाग का संग्रहालय होगा ऑनलाइन
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग का संग्रहालय मानव सभ्यता की विकास यात्रा के साक्ष्यों का साक्षी बना हुआ है। यहां लाखों वर्ष पुराने औरत और बच्चे के कंकाल हैं तो पाषाण युगीन जंगली भैंसों के अवशेष और हाथी दांत भी हैं।
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग का संग्रहालय मानव सभ्यता की विकास यात्रा के साक्ष्यों का साक्षी बना हुआ है। यहां लाखों वर्ष पुराने औरत और बच्चे के कंकाल हैं तो पाषाण युगीन जंगली भैंसों के अवशेष और हाथी दांत भी हैं। पत्थरों और जानवरों की हड्डियों ने किस तरह से नुकीले औजारों का रूप धारण किया इसके भी साक्ष्य हैं। खास यह कि इन्हें ऑनलाइन देखा जा सकेगा।
भारत के चुनिंदा म्युजियम में से एक विश्वविद्यालय के इस संग्रहालय को डिजिटल करने के साथ अब ऑनलाइन किया जाएगा। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एआई कैमरों से लैस इस संग्रहालय को इस तरह से देखा जा सकेगा जैसे यहां भ्रमण कर रहे हैं। मानव सभ्यता की गुत्थियों को सुलझाने में जुटे देश-विदेश के वैज्ञानिकों के लिए विश्वविद्यालय का यह फैसला काफी मददगार बताया जा रहा है।
विभागाध्यक्ष प्रो. रमाकांत ने बताया कि संग्रहालय को ऑनलाइन करने का निर्णय लिया गया है। इसमें रखे पुरातात्विक अवशेषों का कहीं से भी ऑनलाइन अध्ययन किया जा सकेगा। इसमें अलग-अलग विषयों के विशेषज्ञ भी नियुक्त होंगे जिनसे साक्ष्यों के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकेगी। इस संग्रहालय के ऑनलाइन इस्तेमाल के अनुसार शुल्क भी रखा जाएगा हालांकि यह काफी कम होगा।
प्रतापगढ़, कौशाम्बी, मध्य प्रदेश की पुरातात्विक साइटों ने किया समृद्ध
विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अतुल नारायण सिंह और पुरातत्व विशेषज्ञ डॉ. संजय कुमार कुशवाहा का कहना है कि संग्रहालय में विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं के साक्ष्य क्रमबद्ध तरीके से रखे गए हैं। उनका दावा है कि इस लिहाज से यह देश का सबसे समृद्ध संग्रहालय है। इसमें ईसा काल से लेकर लाखों वर्ष पुराने साक्ष्य उपलब्ध हैं। इस संग्रहालय को समृद्ध करने में प्रतापगढ़, कौशाम्बी, मध्य प्रदेश के प्राचीन स्थलों का मुख्य योगदान है।
उन्होंने बताया कि कौशाम्बी में हेरिति (बच्चों की चोरी करने वाली महिला जिसे सुधारने के लिए महात्मा बुद्ध ने ज्ञान दिया), गजलक्ष्मी समेत कई दुर्लभ मूर्तियां और अन्य साक्ष्य पाए गए हैं। प्रतापगढ़ के दमदमा, मैदहा और सराय नाहर से महिला व बच्चे के कंकाल, मध्य प्रदेश के बघोर साइट से मातृ देवी की प्रतिमा समेत कई साक्ष्य मिले हैं। डॉ. अतुल का कहना है कि कंकाल लाखों वर्ष पुराने हैं। वहीं मातृ देवी की प्रतिमा को मूर्ति पूजा के पहले साक्ष्य के रूप में माना जाता है।
आम लोगों के लिए भी खुला संग्रहालय
विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग का संग्रहालय आम लोगों के लिए भी खोल दिया गया है हालांकि इसके लिए फीस निर्धारित की गई है। विद्यार्थियों से पांच रुपये शुल्क लिया जाएगा। वहीं अन्य लोगों के लिए 20 रुपये शुल्क रखा गया है। यहां रखे पुरातात्विक अवशेषों के बारे में जानकारी देने के लिए शिक्षक भी मौजूद रहेंगे।
सदियों पुरानी मूर्तियों की कीमत करोड़ों में, पांच करोड़ में हुआ था बीमा
संग्रहालय में रखीं मूर्तियों और अन्य अवशेषों की कीमत करोड़ों में है। इनमें से मातृ देवी, हेरिति, गजलक्ष्मी और कुबेर की मूर्तियां व लोटस लैंप का कई देशों में प्रदर्शन किया जा चुका है। इसी क्रम में इन मूर्तियों को 2004 में पेरिस में आयोजित अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी में रखा गया था। डॉ. अतुल ने बताया कि दूसरे शहर या विदेश ले जाने से पहले इन मूर्तियाें का बीमा कराया जाता है। इनकी कीमत का आंकलन इससे ही लगाया जा सकता है कि फ्रांस ले जाने से पहले इन मूर्तियों का पांच करोड़ रुपये में बीमा कराया गया था।