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आज भी साइकिल से चलते हैं मेजा के पूर्व विधायक रामदेव कोल
इलाहाबाद, ब्यूरो
Updated Wed, 11 Jan 2017 01:32 AM IST
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political news
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विधायकी गुरूर के पंख हासिल कर रुतबे के आसमान में उड़ने वाले आजकल के विधायकों से इतर पूर्व एमएलए रामदेव सादगी की नजीर हैं। सन् 1974 में मेजा विधानसभा से विधायक चुने गए रामदेव कोल आज भी साइकिल से चलते हैं। दो साल पहले तक आमदनी के लिए वह कोरांव तहसील में मुंशीगिरी किया करते थे। उनके पास न तो कोई बाइक है और न ही कोई अन्य वाहन।
मेजा के लक्षनकापूरा गांव के रामदेव कोल सन् 1974 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस (सिंडीकेट) से प्रत्याशी थे। उन्होंने कांग्रेस के विश्राम दास को 24 हजार मतों से पराजित किया था। मेजा का विधायक निर्वाचित होने के बाद रामदेव कोल तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नन्दन बहगुणा के बेहद करीबी हो गए थे। आज पूर्व विधायक रामदेव कोल दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करते नजर आते हैं। उन्होंने बताया कि बुढ़ापे की नाव खेने के लिए वह कोरांव तहसील में रजिस्ट्री लेखन का काम कर रहे थे लेकिन अस्वस्थता की वजह से कोरांव जाना बंद कर दिया। पैर और कमर में ज्यादा तकलीफ बढ़ जाने की वजह से वे बेहद परेशान नजर आते हैं फिर भी रोज साइकिल से मेजा जाते हैं फिर शाम को घर चले आते हैं। बताते हैं कि तीन वर्ष तक सत्ता में रहने के बाद 1977 में सरकार गिर गई थी। 1977 में उन्होंने चुनाव लड़ा था लेकिन जनता पार्टी के उम्मीदवार जवाहर लाल की आंधी के आगे वे टिक नहीं पाए। इसके बाद कांग्रेस छोड़कर उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली। बाद में भी कई बार प्रयास किया लेकिन उन्हें चुनाव लड़ने का मौका ही नहीं मिला।
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मेजा के लक्षनकापूरा गांव के रामदेव कोल सन् 1974 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस (सिंडीकेट) से प्रत्याशी थे। उन्होंने कांग्रेस के विश्राम दास को 24 हजार मतों से पराजित किया था। मेजा का विधायक निर्वाचित होने के बाद रामदेव कोल तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नन्दन बहगुणा के बेहद करीबी हो गए थे। आज पूर्व विधायक रामदेव कोल दो जून की रोटी के लिए संघर्ष करते नजर आते हैं। उन्होंने बताया कि बुढ़ापे की नाव खेने के लिए वह कोरांव तहसील में रजिस्ट्री लेखन का काम कर रहे थे लेकिन अस्वस्थता की वजह से कोरांव जाना बंद कर दिया। पैर और कमर में ज्यादा तकलीफ बढ़ जाने की वजह से वे बेहद परेशान नजर आते हैं फिर भी रोज साइकिल से मेजा जाते हैं फिर शाम को घर चले आते हैं। बताते हैं कि तीन वर्ष तक सत्ता में रहने के बाद 1977 में सरकार गिर गई थी। 1977 में उन्होंने चुनाव लड़ा था लेकिन जनता पार्टी के उम्मीदवार जवाहर लाल की आंधी के आगे वे टिक नहीं पाए। इसके बाद कांग्रेस छोड़कर उन्होंने भाजपा ज्वाइन कर ली। बाद में भी कई बार प्रयास किया लेकिन उन्हें चुनाव लड़ने का मौका ही नहीं मिला।
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