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हाईकोर्ट का अहम फैसला : छह साल के बच्चे की पसंद अभिरक्षा का निर्णायक आधार नहीं, उसका कल्याण सर्वोपरि

Sat, 17 Oct 2026 03:41 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 17 Oct 2026 03:41 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छह साल के बच्चे की अभिरक्षा के मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि कम उम्र के बच्चे की पसंद को अभिरक्षा तय करने का निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता।

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Significant High Court ruling: A six-year-old child's preference is not the deciding factor for custody
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने छह साल के बच्चे की अभिरक्षा के मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि कम उम्र के बच्चे की पसंद को अभिरक्षा तय करने का निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता। उसका कल्याण सर्वोपरि है। न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने आगरा के परिवार न्यायालय का आदेश रद्द कर बच्चे की अभिरक्षा मां को सौंपने का आदेश दिया है। साथ ही दादी को बच्चे से मिलने का अधिकार दिया है। महिला के पति की वर्ष 2020 में मृत्यु हो गई थी। उस समय उनका बेटा महज आठ महीने का था।

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महिला का आरोप था कि बीमा का दावा दिलाने के बहाने उससे सादे कागज पर हस्ताक्षर कराए गए, जिसका इस्तेमाल कथित समझौता तैयार करने में किया गया। इसके बाद बच्चे को दादी के पास रख दिया गया। बच्चे से मिलने नहीं दिया तो मां ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अभिरक्षा मांगी।
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दादी की ओर से दलील दी गई कि बच्चा लंबे समय से उनके साथ रह रहा है। उनके साथ रहने का आदी हो चुका है। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि छह साल का बच्चा अपने भावनात्मक और शारीरिक हितों को समझकर स्वतंत्र व उचित निर्णय लेने में सक्षम नहीं होता। लंबे समय तक मां से दूर रखने के कारण उसकी पसंद प्रभावित होने की आशंका भी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिता की मृत्यु के बाद मां प्राकृतिक संरक्षक है। कथित समझौते, वसीयत या आर्थिक परिस्थितियों से अधिक महत्वपूर्ण बच्चे का कल्याण है। इसी आधार पर अदालत ने मां की अपील स्वीकार कर ली।

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