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इंसानियत : गैरों से दिखाया अपनापन, आरिफ अंसारी 600 अज्ञात शवों की करा चुके हैं पहचान, परिजनों से मिलवाया

Sun, 28 Jan 2024 03:05 PM IST
विनोद सिंह सत्येंद्र पटेल, प्रयागराज
सत्येंद्र पटेल, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 28 Jan 2024 03:05 PM IST
सार

आरिफ (47) बताते हैं कि करीब नौ साल पहले की बात है। उन दिनों अक्सर एसआरएन अस्पताल जाया करता था। भर्ती अज्ञात लोगों को दवा और देखरेख में मदद कर देता। एक रोज अज्ञात महिला मिलीं। बोली से अंदाजा हुआ कि शायद बंगाल की रहने वाली हैं।

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Showed his closeness to strangers, Arif introduced 600 unidentified dead bodies to their families.
आरिफ अंसारी। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

दायराशाह अजमल निवासी मो. आरिफ अंसारी की कोई बड़ी पहचान नहीं। बस, काम बड़ा करते हैं। अभी तक 600 अज्ञात शवों को अपनों से मिलवा चुके हैं। इस धुन की प्रेरणा बनीं बंगाली अम्मा। आठ साल पहले अस्पताल में भर्ती अम्मा की सेवा करते इतना लगाव हुआ कि उनका घर खोजने में जुट गए। पर, पता मिलने से पहले ही अम्मा छोड़ गईं...आरिफ को मानव धर्म निभाने का जिम्मा देकर।

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आरिफ (47) बताते हैं कि करीब नौ साल पहले की बात है। उन दिनों अक्सर एसआरएन अस्पताल जाया करता था। भर्ती अज्ञात लोगों को दवा और देखरेख में मदद कर देता। एक रोज अज्ञात महिला मिलीं। बोली से अंदाजा हुआ कि शायद बंगाल की रहने वाली हैं। वह थोड़ा विक्षिप्त भी लग रही थीं। लोग पता पूछते तो वह बंगाली में कुछ बड़बड़ातीं। इसे कोई समझ नहीं पाता। वह उन्हें चाय-बिस्कुट देने लगे।
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थोड़े दिन में वह सहज हुईं तो बातचीत में पढ़ी-लिखी मालूम चलीं। उनसे पता लिखवाया। घर खोज पाते कि उसके पहले ही वह गुजर गईं। इससे बड़ा झटका लगा मुझे। सोचा... काश पहले पता पूछ लिया होता तो परिजनों को जीते-जी मिलवा देता। उसी दिन यह ठान लिया कि अब जितने अज्ञात शव मिलेंगे, उनके परिजनों से मिलवाने में जुटेंगे। आठ साल में 600 शवों की पहचान करा चुका हूं।

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सोशल मीडिया-पुलिस की मदद से कराते हैं पहचान

आरिफ ने अज्ञात-गुमशुदा तलाश के नाम से व्हाट्सएप ग्रुप बनाए हैं। इसमें जिले के साथ-साथ आसपास के जिलों की पुलिस व समाजसेवी जुड़े हुए हैं। जब भी कोई अज्ञात शव मिलता है तो थाने की पुलिस से तस्वीर लेकर विभिन्न ग्रुपों पर डाल देते हैं। इससे पहचान करना आसान हो जाता है।

बुराई करने वाले आज कर रहे तारीफ

बकौल आरिफ, शुरू में सोशल मीडिया ग्रुपों पर अज्ञात शवों की तस्वीरें डालने पर कई लोग कहते थे कि हिंदू है, उसके बारे में क्यों पता कर रहे हो। कई बार लोग धार्मिक टिप्पणियां भी करते थे। मैंने सबको नजरअंदाज किया। मेरे लिए इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है।

डॉक्टर बनने का था सपना, हादसे ने तोड़ा

आरिफ की तमन्ना डॉक्टर बनने की थी। इंटर के बाद वह इसकी तैयारी भी कर रहे थे। एक दिन स्कूटर से बैंक की तरफ जा रहे थे कि विश्वविद्यालय के सामने तेज रफ्तार कार ने उन्हें टक्कर मार दी। इसमें उनका बायां पैर टूट गया। हादसे ने पैर ही नहीं तोड़ा, उनका डॉक्टर बनने का हौसला और सपना भी चकनाचूर कर दिया।

24 घंटे में ही मृतक के भाई तक पहुंचे

28 नवंबर-23 की बात है। पूना से घर लौटते समय एक युवक की ट्रेन से गिरकर छिवकी स्टेशन के पास मौत हो गई। पहचान नहीं होने की बात आरिफ को पता लगी। उन्होंने तस्वीरें लेकर अपने ग्रुपों के साझा कीं। अगले ही दिन भाई दशरथ ने मृतक की पहचान फाफामऊ के गौरा बारी गांव निवासी मंगला प्रसाद के रूप में की।

दो दिन में हो गई साधु की शिनाख्त

मिर्जापुर के रहने वाले एक साधु का पिछले साल 20 जनवरी को सदर कोतवाली थाना क्षेत्र में अज्ञात रूप में शव मिला था। ग्रुप में तस्वीरें साझा करने के दो दिन बाद साधु की पहचान उनके भतीजे राहुल पांडे ने की। घर वाले आए और शव का विधि विधान से अंतिम संस्कार कराया।

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