रमजान : हजार महीनों से ज्यादा बेहतर है शबे कद्र, पूरी रात हुई मस्जिदों में इबादत
मस्जिदों में शबे कद्र की रात में नाफिल नमाज, कुरआन पाक की तिलावत, कलमए शहादत और दरूद शरीफ पढ़े गए। शहर काजी मुफ्ती शफीक अहमद शरीफी ने शबे कद्र की फजीलत बयान की। कहा, इस रात इबादत का सवाब एक हजार महीनों से बेहतर है।
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रमजानुल मुबारक की छब्बीसवीं रात यानी शनिवार को शहर की सभी मस्जिदों में शबे कद्र के आमाल अंजाम दिए गए। नमाजी व रोजेदार पूरी रात मस्जिदों में इबादत में मशगूल रहे। यह सिलसिला सहरी के समय तक चला, जिसके बाद मस्जिद में ही सभी को सहरी खिलाई गई। इस अवसर पर मस्जिदों को रंगीन झालरों से सजाया भी गया।
मस्जिदों में शबे कद्र की रात में नाफिल नमाज, कुरआन पाक की तिलावत, कलमए शहादत और दरूद शरीफ पढ़े गए। शहर काजी मुफ्ती शफीक अहमद शरीफी ने शबे कद्र की फजीलत बयान की। कहा, इस रात इबादत का सवाब एक हजार महीनों से बेहतर है। कुरआन में कहा गया है कि इस रात में खुदा अपने बंदों की दुआओं को कबूल करता है और उसके तमाम गुनाहों को माफ कर देता है।
इस रात इबादत करने की खास ताकीद की गई है। वहीं, शबे कद्र के अवसर पर शनिवार को बहादुरगंज स्थित छोटी मस्जिद में मौलाना मो. मियां फारूकी की इमामत में तरावीह की नमाज मुकम्मल हुई। इस अवसर पर उन्हें तोहफे भी दिए गए। मो. मियां 15 वर्ष की उम्र से ही तरावीह की नमाज पढ़ा रहे हैं।
अल्लाह के नबी ने भी की इबादत
रमजान का हर दिन-हर रात अफजल है। लेकिन शबे कद्र की रात हजार महीनों की इबादत से ज्यादा अफजल है। अल्लाह ने अपनी अजीम किताब कुरआन पाक में इस रात की फजीलत को बयान किया है और इस रात के नाम से सूरह कद्र को भी नाजिल किया है। इस रात में रहमत की बारिश होती है, गुनाहों की बख्शिश होती है और सारी बलाएं दूर होती हैं। इस रात में खुद अल्लाह के नबी हजरत मोहम्मद साहब ने भी खूब इबादतें की हैं। यह रात इसलिए सबसे अहम है क्योंकि इसी रात में अल्लाह ने कुरआन पाक को जमीन पर नाजिल किया है। - मौलाना नादिर हुसैन, मदरसा मुनव्वरिया बशीरुल उलूम
मस्जिद मौलाना मो. मियां फारुकी छोटा दायरा में शौकत मास्टर व हाफिज असद एतकाफ में बैठे हैं। वहीं, चौक स्थित जामा मस्जिद में भी करीब एक दर्जन लोग एतकाफ में बैठे हैं। मस्जिद के इमाम ने बताया कि एतकाफ में बैठने का सवाह दो हज और दो उमरे के बराबर का है। एतकाफ में बैठने वाले लोग ईद का चांद देखने के बाद ही मस्जिद से निकलेंगे। एतकाफ में लोग मस्जिदों में ही दिन-रात रहते हैं, मोहल्ले के लोग उनके सहरी व इफ्तार की व्यवस्था करते हैं। एतकाफ के दौरान लोग इबादत में ही मशगूल रहते हैं। उन्हें परिवार, दुनिया व अन्य चीजों से कोई वास्ता नहीं होता है।