High Court : भाट को एसटी में शामिल करने की मांग वाली याचिका पर सरकार से मांगा जवाब
अखिल भारतीय भाट समाज एकता, इसके अध्यक्ष पवनेंद्र कुमार व एडवोकेट घनश्याम मौर्य ने जनहित याचिका में तर्क दिया है कि आजादी के 75 साल बाद भी भाट समुदाय को विमुक्त जनजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में भाट जाति को एसटी श्रेणी में शामिल करने की मांग वाली जनहित याचिका पर केंद्र व राज्य सरकार से जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता व न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की खंडपीठ अखिल भारतीय भाट समाज एकता व अन्य की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने सुनवाई की अगली तिथि 22 अगस्त निर्धारित की है।
अखिल भारतीय भाट समाज एकता, इसके अध्यक्ष पवनेंद्र कुमार व एडवोकेट घनश्याम मौर्य ने जनहित याचिका में तर्क दिया है कि आजादी के 75 साल बाद भी भाट समुदाय को विमुक्त जनजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है। उन्हें एसटी श्रेणी में शामिल करने का मामला लंबित है। याचियों ने सार्वजनिक रोजगार में अनुसूचित जनजातियों के रूप में भाट समुदाय को आरक्षण प्रदान करने की मांग की है।
जनहित याचिका में कहा गया है कि राज्य के कुछ जिलों में रहने वाले विमुक्त जनजाति भाट समुदाय को एक सरकारी आदेश (मई 1961) द्वारा विशेष दर्जा दिया गया था। इसमें यह प्रावधान था कि शिक्षा, अकादमिक और सामाजिक कल्याण योजनाओं के प्रयोजनों के लिए विमुक्त जनजातियों को भारत के विभिन्न राज्यों में सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण के लिए अनुसूचित जनजातियों के रूप में माना जाना चाहिए।
जनहित याचिका में आगे कहा गया है कि जून 2013 में उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी जिला मजिस्ट्रेटों और आयुक्तों को एक आदेश जारी किया, जिसमें जाति प्रमाण पत्र के लिए पात्र विमुक्त जनजातियों को विमुक्त जनजाति (विमुक्त जाति) के रूप में सूचीबद्ध किया गया। इसमें विशेष रूप से विमुक्त जनजातियों (ख) के तहत सीरियल नंबर 07 पर ''भाट'' समुदाय को शामिल किया गया।
हालांकि राज्य सरकार ने जून 2013 के आदेश में भाट समुदाय को विमुक्त जनजाति/विमुक्त जाति के रूप में मान्यता दी थी और उन्हें एससी/एसटी श्रेणी में स्वीकार करते हुए जाति प्रमाण पत्र जारी किए थे। इसके बावजूद, भाट समुदाय को सार्वजनिक रोजगार और शैक्षणिक संस्थानों में लाभ नहीं मिले हैं। जनहित याचिका में कहा गया है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने भी समय-समय पर विभिन्न जातियों का वर्गीकरण किया है, लेकिन भाट जाति को अनुसूचित जनजाति के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है।
याचिकाकर्ताओं ने अपनी जनहित याचिका में कहा है कि अन्य विमुक्त जनजातियां बंजारा, भर, गंदीला, मल्लाह, केवट, मेवाती, नट, गूजर, गोंड, भोटिया, बुक्सा, जन्नसरी को यूपी के विभिन्न जिलों में ओबीसी, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत रखा गया है, उन्हें सार्वजनिक रोजगार और शिक्षा में आरक्षण का लाभ मिल रहा है।