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माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड अध्यक्ष का इस्तीफा
ब्यूरो/अमर उजाला इलाहाबाद
Updated Sat, 25 Apr 2015 02:30 AM IST
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इलाहाबाद। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. परशुराम पाल ने शुक्रवार को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। शासन की ओर से एक अगस्त 2014 को इस पद पर मनोनयन और 20 अगस्त को पदभार ग्रहण करने वाले डॉ. परशुराम ने आठ महीने में ही पद छोड़ दिया। सचिव माध्यमिक जितेंद्र कुमार ने उनका इस्तीफा मंजूर करके इसकी जानकारी चयन बोर्ड सचिव को भेज दी है। इस पद पर अब तक किसी को प्रभार नहीं सौंपा गया है। पाल के इस्तीफे के बाद चयन बोर्ड में चल रहा प्रधानाचार्य पद का साक्षात्कार भी स्थगित कर दिया गया है। बोर्ड में लखनऊ मंडल के लिए प्रधानाचार्यों का साक्षात्कार जारी था।
बता दें, चयन बोर्ड अध्यक्ष का पद बीते तीन वर्षों से कांटों भरा रहा है। प्रदेश में सपा की सरकार बनने के बाद इस पद पर तैनात डॉ.आरपी वर्मा ने भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद शासन ने पांच फरवरी 2013 को डॉ. देवकीनंदन शर्मा को अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया। दिसंबर 2013 में ही डॉ.शर्मा का निधन हो गया। शासन ने बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य डॉ. आशाराम यादव को अध्यक्ष का पदभार सौंपा, उनकी ओर से प्रधानाचार्य के चयन में मनमानी की शिकायत के बाद अगस्त 2014 में लखनऊ विवि के हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. परशुराम पाल को अध्यक्ष बनाया गया। अब माना जा रहा है कि शासन के ही निर्देश पर डॉ. पाल ने इस्तीफा दिया है। हालांकि, फिलहाल इस बारे में उन्होंने कुछ भी बोलने से मना कर दिया।
चयन बोर्ड के अध्यक्ष का पदभार ग्रहण करने के बाद डॉ. परशुराम पाल ने पूर्व अध्यक्ष डॉ. आशाराम यादव के कार्यकाल में कराए गए प्रधानाचार्य के साक्षात्कार निरस्त करने की घोषणा की। साथ ही टीजीटी-पीजीटी परीक्षा में पारदर्शिता का भी वायदा किया था। इसमें वह पूरी तरह से सफल भी रहे। जनवरी-फरवरी में हुई टीजीटी-पीजीटी परीक्षा 2013 में इतिहास प्रवक्ता के प्रश्नपत्र में गलत सवाल पूछने के मामले पर उन्होंने इतिहास की एक सीरीज में गलत प्रश्न पूछने की बात स्वीकार की और परीक्षा निरस्त करने की कार्रवाई की।
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चयन बोर्ड के सूत्रों का कहना है कि टीजीटी-पीजीटी परीक्षा जनवरी-फरवरी में पूरी करने के बाद अध्यक्ष डॉ. परशुराम पाल ने उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में पूरी पारदर्शिता की बात दोहराई थी। चर्चा है कि शासन जिस एजेंसी के जरिए ओएमआर का मूल्यांकन करवाना चाह रहा था, अध्यक्ष डॉ. पाल उसके पक्ष में नहीं थे। प्रवक्ता इतिहास की निरस्त परीक्षा पर जहां चयन बोर्ड के कुछ सदस्य एवं अधिकारी एजेंसी पर कार्रवाई के पक्ष में थे तो अध्यक्ष परीक्षा परिणाम जल्द घोषित करने के लिए उसका सहयोग कर रहे थे। चर्चा है कि टीजीटी-पीजीटी परीक्षा के बाद शासन की मंशा के अनुरूप एजेंसी से मूल्यांकन न करवाकर अध्यक्ष ने परीक्षा कराने वाली एजेंसी से ही मूल्यांकन कराने का निश्चय किया था। माना जा रहा है कि यही टकराव उनके इस्त्तीफे की वजह बन गया।
चयन बोर्ड अध्यक्ष डॉ.परशुराम पाल के विरोधियों ने उन्हें इटावा में बसपा की रैली में शामिल होने के पोस्टर पूरे लखनऊ में लगा दिए हैं। इसमें डॉ. पाल को बाबा साहब अंबेडकर की फोटो के साथ दिखाया गया है। यह घटना प्रदेश में सत्ताधारी पार्टी को नाराज करने वाली रही। अध्यक्ष को हटाने के लिए चयन बोर्ड के ही एक पूर्व सदस्य की भूमिका देखी जा रही है। चयन बोर्ड सूत्रों का कहना है कि चयन बोर्ड की नियुक्तियों में अपने लोगों को दरकिनार किए जाने से सदस्यों के साथ अधिकारियों ने साजिशकर्ता की भूमिका निभाई।
लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ. अनिल यादव के खिलाफ छात्रों की ओर से लंबे अर्से से आंदोलन चलाए जाने के बाद भी उन्हें नहीं हटाया गया, परंतु प्रतियोगी छात्रों की अपेक्षा के अनुरूप काम कर रहे डॉ. परशुराम पाल को हटा दिया गया। डॉ. पाल को जहां पारदर्शिता के लिए हटा दिया गया, वहीं पूर्व अध्यक्ष डॉ. आशाराम यादव को विधान परिषद में सवाल उठाने तथा अधिकारियों के साथ मनमानी करने पर भी नहीं हटाया गया था।
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. परशुराम पाल एवं चयन बोर्ड जितेंद्र कुमार के बीच कभी नहीं पटी। उन्होंने प्रमुख सचिव कार्मिक राजीव कुमार को जितेंद्र कुमार को हटाकर पूर्व सचिव बीएल सरोज को नियुक्त करने के लिए पत्र लिखा था।
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बता दें, चयन बोर्ड अध्यक्ष का पद बीते तीन वर्षों से कांटों भरा रहा है। प्रदेश में सपा की सरकार बनने के बाद इस पद पर तैनात डॉ.आरपी वर्मा ने भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद शासन ने पांच फरवरी 2013 को डॉ. देवकीनंदन शर्मा को अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया। दिसंबर 2013 में ही डॉ.शर्मा का निधन हो गया। शासन ने बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य डॉ. आशाराम यादव को अध्यक्ष का पदभार सौंपा, उनकी ओर से प्रधानाचार्य के चयन में मनमानी की शिकायत के बाद अगस्त 2014 में लखनऊ विवि के हिंदी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. परशुराम पाल को अध्यक्ष बनाया गया। अब माना जा रहा है कि शासन के ही निर्देश पर डॉ. पाल ने इस्तीफा दिया है। हालांकि, फिलहाल इस बारे में उन्होंने कुछ भी बोलने से मना कर दिया।
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चयन बोर्ड के अध्यक्ष का पदभार ग्रहण करने के बाद डॉ. परशुराम पाल ने पूर्व अध्यक्ष डॉ. आशाराम यादव के कार्यकाल में कराए गए प्रधानाचार्य के साक्षात्कार निरस्त करने की घोषणा की। साथ ही टीजीटी-पीजीटी परीक्षा में पारदर्शिता का भी वायदा किया था। इसमें वह पूरी तरह से सफल भी रहे। जनवरी-फरवरी में हुई टीजीटी-पीजीटी परीक्षा 2013 में इतिहास प्रवक्ता के प्रश्नपत्र में गलत सवाल पूछने के मामले पर उन्होंने इतिहास की एक सीरीज में गलत प्रश्न पूछने की बात स्वीकार की और परीक्षा निरस्त करने की कार्रवाई की।
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चयन बोर्ड के सूत्रों का कहना है कि टीजीटी-पीजीटी परीक्षा जनवरी-फरवरी में पूरी करने के बाद अध्यक्ष डॉ. परशुराम पाल ने उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में पूरी पारदर्शिता की बात दोहराई थी। चर्चा है कि शासन जिस एजेंसी के जरिए ओएमआर का मूल्यांकन करवाना चाह रहा था, अध्यक्ष डॉ. पाल उसके पक्ष में नहीं थे। प्रवक्ता इतिहास की निरस्त परीक्षा पर जहां चयन बोर्ड के कुछ सदस्य एवं अधिकारी एजेंसी पर कार्रवाई के पक्ष में थे तो अध्यक्ष परीक्षा परिणाम जल्द घोषित करने के लिए उसका सहयोग कर रहे थे। चर्चा है कि टीजीटी-पीजीटी परीक्षा के बाद शासन की मंशा के अनुरूप एजेंसी से मूल्यांकन न करवाकर अध्यक्ष ने परीक्षा कराने वाली एजेंसी से ही मूल्यांकन कराने का निश्चय किया था। माना जा रहा है कि यही टकराव उनके इस्त्तीफे की वजह बन गया।
चयन बोर्ड अध्यक्ष डॉ.परशुराम पाल के विरोधियों ने उन्हें इटावा में बसपा की रैली में शामिल होने के पोस्टर पूरे लखनऊ में लगा दिए हैं। इसमें डॉ. पाल को बाबा साहब अंबेडकर की फोटो के साथ दिखाया गया है। यह घटना प्रदेश में सत्ताधारी पार्टी को नाराज करने वाली रही। अध्यक्ष को हटाने के लिए चयन बोर्ड के ही एक पूर्व सदस्य की भूमिका देखी जा रही है। चयन बोर्ड सूत्रों का कहना है कि चयन बोर्ड की नियुक्तियों में अपने लोगों को दरकिनार किए जाने से सदस्यों के साथ अधिकारियों ने साजिशकर्ता की भूमिका निभाई।
लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष डॉ. अनिल यादव के खिलाफ छात्रों की ओर से लंबे अर्से से आंदोलन चलाए जाने के बाद भी उन्हें नहीं हटाया गया, परंतु प्रतियोगी छात्रों की अपेक्षा के अनुरूप काम कर रहे डॉ. परशुराम पाल को हटा दिया गया। डॉ. पाल को जहां पारदर्शिता के लिए हटा दिया गया, वहीं पूर्व अध्यक्ष डॉ. आशाराम यादव को विधान परिषद में सवाल उठाने तथा अधिकारियों के साथ मनमानी करने पर भी नहीं हटाया गया था।
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. परशुराम पाल एवं चयन बोर्ड जितेंद्र कुमार के बीच कभी नहीं पटी। उन्होंने प्रमुख सचिव कार्मिक राजीव कुमार को जितेंद्र कुमार को हटाकर पूर्व सचिव बीएल सरोज को नियुक्त करने के लिए पत्र लिखा था।