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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   second gathering of Bazm E Virasat begins; Dastan-e-Sarfaroshi brings back memories of the Kakori incident

Prayagraj : बज्म के विरासत की दूसरी महफिल का शुभारंभ, दास्तान ए सरफरोशी में काकोरी कांड की यादें हुईं ताजा

Fri, 19 Dec 2025 05:29 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 19 Dec 2025 05:29 PM IST
सार

बज्म-ए-विरासत के दूसरे संस्करण की शुरुआत शुक्रवार को हुई। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सुधांशु धूलिया ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

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second gathering of Bazm E Virasat begins; Dastan-e-Sarfaroshi brings back memories of the Kakori incident
बज्म ए विरासत के दूसरे संस्करण का शुभारंभ करते जस्टिस हिमांशु धुलिया। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

बज्म-ए-विरासत के दूसरे संस्करण की शुरुआत शुक्रवार को हुई। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सुधांशु धूलिया ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। जस्टिस धूलिया ने कहा कि जब उन्हें इस कार्यक्रम का उद्घाटन करने के लिए आमंत्रित किया गया तो यह उनके लिए “घर की बात” जैसा अनुभव था। कहा कि वे यहां भाषण देने नहीं बल्कि “दिल से दिल की बात” करने आए हैं। अपने शहर से जुड़ाव को भावुकता से याद करते हुए न्यायाधीश धूलिया ने कहा कि “यही वह शहर है जिसने हमें सब कुछ दिया। यहीं हमने पढ़ना-लिखना सीखा, यहीं हमने दोस्ती की। इसी शहर में हमने सबसे पहले मोहब्बत करना सीखा।” जब उनसे पूछा गया कि इलाहाबाद ने उन्हें क्या दिया, तो न्यायाधीश धूलिया ने फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के सदाबहार शब्दों के माध्यम से उत्तर दिया और यह पंक्तियाँ पढ़ीं: 

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अज़ीज़ी सीखी, ग़रीबों की हिमायत सीखी,
या-सो-हिरमान के दुख-दर्द के मअनी सीखे,
ज़ेर-दस्तों के मसाइब को समझना सीखा,
सर्द आहों के रुख़-ए-ज़र्द के मअनी सीखी।

कार्यक्रम में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के काकोरी एक्सप्रेस के शहीदों को भी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई। “दास्तान-ए-सरफरोशी” से हुई, जिसे प्रसिद्ध और अत्यंत प्रतिभाशाली दास्तानगो हिमांशु बाजपेयी ने पेश किया। उन्होंने शहीदों की वीरता की दास्तां सुनाकर लोगों में देशभक्ति का जोश भरने का काम किया। बज़्म-ए-विरासत दूसरी महफ़िल की यह शुरुआत त्याग को नमन करने, विरासत का उत्सव मनाने और इलाहाबाद की स्थायी सांस्कृतिक तथा भावनात्मक धरोहर को पुनः स्थापित करने वाली एक गहन और आत्मिक धुन पर सधी हुई थी।
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