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स्कूली बस संचालकों ने बढ़ा दी फीस
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Tue, 12 Jul 2016 02:19 AM IST
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शहर के पब्लिक एवं कान्वेंट स्कूलों में लगी स्कूली बसों के संचालकों ने मनमाने तरीके से बसों का किराया प्रति बच्चा 200 से 300 रुपये तक बढ़ा दिया है। अधिकतर प्राइवेट स्कूलों में निजी बसें ही लगी हुई हैं। बस संचालकों के प्रति स्कूल प्रशासन कोई जिम्मेदारी नहीं लेता। वहीं बस संचालकों का कहना है कि नए सत्र से स्कूल प्रबंधन के कमीशन बढ़ा देने से बस की फीस बढ़ानी पड़ी।
वाहन चालकों की ओर से किराए में प्रति छात्र-छात्रा 200 से 300 के बीच बढ़ोतरी किए जाने से परेशान अभिभावकों ने विरोध भी किया, परंतु बच्चों को स्कूल भेजने की मजबूरी ने उनके मुंह बंद कर दिए हैं। वाहन चालकों का कहना है कि नए सत्र में स्कूल वालों की ओर से अपने कमीशन में बढ़ोतरी किए जाने के बाद उन्हें मजबूरी में किराया बढ़ाना पड़ा है। जिन अभिभावकों के दो-तीन बच्चे बस, टैक्सी, ऑटो से स्कूल जा रहे हैं, उन्हें सीधा एक हजार की चपत लग रही है। अप्रैल में स्कूल वालों की ओर से मनमाने तरीके से फीस एवं किताब के दाम में बढ़ोतरी के बाद अब जुलाई से वाहन भाड़े में बढ़ोतरी अभिभावकों पर दोहरी चपत है। अभिभावक प्रण विजय, मुनीश तिवारी, ज्योति पांडेय, लक्ष्मण चतुर्वेदी ने वाहन मालिकों की मनमानी का विरोध किया है। उन्होंने स्कूल संचालकों से बच्चों के लिए बस चलाने की मांग की है।
अभिभावक जांचें वाहनों की स्थिति
अभिभावकों एवं समाज के जागरूक नागरिकों का यह दायित्व बनता है कि वे बच्चों की सुरक्षा के लिए निजी बस संचालकों के मकड़जाल को तोड़ें। इसके लिए स्कूलों में लगी बसों के मालिकों को उनकी जिम्मेदारी के बारे में बताएं। बस चालक का लाइसेंस चेक करने के साथ बस के मेंटिनेंस को चेक करें, बस के पंजीकरण से जुड़े कागज चेक करने के बाद उसके स्कूल से संबद्धता को भी चेक करें। वाहन चालकों की जानकारी के बाद ही किराए में बढ़ोतरी करें।
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स्कूल झाड़ लेते हैं जिम्मेदारी से पल्ला
पुलिस एवं आरटीओ की ओर से अभियान चलाए जाने के बाद स्कूल वाले इन बसों से अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। यहां तक की कई बार अभियान के दौरान बस वाले बच्चों को बीच रास्ते छोड़कर निकल गए हैं और अभिभावकों को सूचना तक नहीं दी। समय-समय पर अभिभावकों के नाम भेजे नोटिस में स्कूल वालों ने स्पष्ट किया है कि स्कूल से संबद्ध वाहन से उनका कोई लेना देना नहीं है। वास्तविकता यह है कि इन बसों का संचालन निजी स्कूलों के कैंपस से हो रहा है। बच्चों के स्कूल आने और जाने के समय बसें स्कूल में पार्क की जाती हैं। बस संचालक अपनी रसीद बुक पर भी स्कूल का नाम छापते हैं, फीस भी स्कूल में बने काउंटर पर जमा होती है। स्कूल की ओर से इन बस संचालकों को कैंपस में बिना रोक-टोक आने की अनुमति है। ऐसे में इन बसों के संचालकों को आखिर में स्कूल प्रबंधन अपने यहां संबद्धता प्रमाण पत्र देने से क्यों बच रहा है।
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वाहन चालकों की ओर से किराए में प्रति छात्र-छात्रा 200 से 300 के बीच बढ़ोतरी किए जाने से परेशान अभिभावकों ने विरोध भी किया, परंतु बच्चों को स्कूल भेजने की मजबूरी ने उनके मुंह बंद कर दिए हैं। वाहन चालकों का कहना है कि नए सत्र में स्कूल वालों की ओर से अपने कमीशन में बढ़ोतरी किए जाने के बाद उन्हें मजबूरी में किराया बढ़ाना पड़ा है। जिन अभिभावकों के दो-तीन बच्चे बस, टैक्सी, ऑटो से स्कूल जा रहे हैं, उन्हें सीधा एक हजार की चपत लग रही है। अप्रैल में स्कूल वालों की ओर से मनमाने तरीके से फीस एवं किताब के दाम में बढ़ोतरी के बाद अब जुलाई से वाहन भाड़े में बढ़ोतरी अभिभावकों पर दोहरी चपत है। अभिभावक प्रण विजय, मुनीश तिवारी, ज्योति पांडेय, लक्ष्मण चतुर्वेदी ने वाहन मालिकों की मनमानी का विरोध किया है। उन्होंने स्कूल संचालकों से बच्चों के लिए बस चलाने की मांग की है।
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अभिभावक जांचें वाहनों की स्थिति
अभिभावकों एवं समाज के जागरूक नागरिकों का यह दायित्व बनता है कि वे बच्चों की सुरक्षा के लिए निजी बस संचालकों के मकड़जाल को तोड़ें। इसके लिए स्कूलों में लगी बसों के मालिकों को उनकी जिम्मेदारी के बारे में बताएं। बस चालक का लाइसेंस चेक करने के साथ बस के मेंटिनेंस को चेक करें, बस के पंजीकरण से जुड़े कागज चेक करने के बाद उसके स्कूल से संबद्धता को भी चेक करें। वाहन चालकों की जानकारी के बाद ही किराए में बढ़ोतरी करें।
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स्कूल झाड़ लेते हैं जिम्मेदारी से पल्ला
पुलिस एवं आरटीओ की ओर से अभियान चलाए जाने के बाद स्कूल वाले इन बसों से अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। यहां तक की कई बार अभियान के दौरान बस वाले बच्चों को बीच रास्ते छोड़कर निकल गए हैं और अभिभावकों को सूचना तक नहीं दी। समय-समय पर अभिभावकों के नाम भेजे नोटिस में स्कूल वालों ने स्पष्ट किया है कि स्कूल से संबद्ध वाहन से उनका कोई लेना देना नहीं है। वास्तविकता यह है कि इन बसों का संचालन निजी स्कूलों के कैंपस से हो रहा है। बच्चों के स्कूल आने और जाने के समय बसें स्कूल में पार्क की जाती हैं। बस संचालक अपनी रसीद बुक पर भी स्कूल का नाम छापते हैं, फीस भी स्कूल में बने काउंटर पर जमा होती है। स्कूल की ओर से इन बस संचालकों को कैंपस में बिना रोक-टोक आने की अनुमति है। ऐसे में इन बसों के संचालकों को आखिर में स्कूल प्रबंधन अपने यहां संबद्धता प्रमाण पत्र देने से क्यों बच रहा है।