धूपबत्ती को चरस बताकर जेल भेजने के मामले में जमानत मंजूर
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि विधि का सिद्धांत है कि जमानत नियम और जेल अपवाद है। जमानत न तो किसी यांत्रिक आदेश से स्वीकार की जा सकती है और न ही अस्वीकार। क्योंकि यह न केवल उस व्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित है, जिसके विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही चल रही है, बल्कि यह दंड न्याय प्रणाली के हित से भी संबंधित है। और यह भी सुनिश्चित करना है कि अपराध करने वाले को न्याय में बाधा डालने का अवसर न दिया जाए।
बरेली के कल्लू उर्फ दिनेश राजपूत की जमानत अर्जी पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति शमीम अहमद ने हिंदी में सुनाए गए फैसले में उपरोक्त टिपप्णी के साथ याची की जमानत मंजूर कर ली है।
कोर्ट का कहना था कि याची किसी गैंग का मुखिया या सदस्य नहीं है। उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। याची के खिलाफ पुलिस ने बरेली के बारादरी थाने में एनडीपीएस एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराया है। उसके पास से 1435 ग्राम चरस और 1815 ग्राम गांजा बरामदगी का आरोप है। याची के अधिवक्ता का कहना था कि याची एक रिक्शा चालक है। उसके खिलाफ झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया है।
पुलिस ने धूपबत्ती को चरस बताकर याची का चालान कर दिया। बरामद माल की जांच नहीं कराई गई। गिरफ्तारी के वक्त का स्वतंत्र साक्षी नहीं है। याची का कोई आपराधिक इतिहास नहीं रहा है। कोर्ट ने जमानत शर्तों के साथ याची को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।