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मेरे राम: हर भाषा की रामकथाएं, सबके अपने राम, भारतीय संस्कृति के पुरुषोत्तम हैं राम
Mon, 08 Jan 2024 12:39 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Mon, 08 Jan 2024 12:39 PM IST
सार
वस्तुतः श्रीराम भारतीय संस्कृति के आदर्श हैं। तथा भारतीय संस्कृति के सबसे उदात्त चरित्र हैं। संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश तथा भारत की अन्य विभिन्न भाषाओं में अनेक राम कथाएं हैं और उन कथाओं के अपने अलग-अलग राम हैं।
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अयोध्या राम मंदिर।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
वास्तव में भारतीय संस्कृति के आदर्श पुरुषोत्तम श्रीराम ही हैं। जहां अन्य वैदिक देवगण परिस्थितिवश कई अवसरों पर मर्यादा का उल्लंघन करते दिखाई दिखाई देते हैं, वहीं राम हर परिस्थिति में मर्यादा के साथ खड़े रहते हैं। भारतीय संस्कृति जिन मूल्यों के लिए जानी जाती है, वे सभी सांस्कृतिक मूल्य श्रीराम के व्यक्तित्व में समाहित हैं।
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वे वैभव की जगह वैराग्य को वरीयता देते हैं, साधन की जगह साधना को महत्त्व देते हैं और ग्रहण की जगह त्याग का चयन करते हैं। परिग्रह के विपरीत अपरिग्रह के साथ खड़े होते हैं। सिंहासन को तिनके की तरह छोड़ देते हैं, वन-वन भटकते हैं, निषादराज को गले लगाते हैं, शबरी के जूठे बेर खाते हैं। यद्यपि उनके ऊपर अग्निपरीक्षा तथा सीता परित्याग जैसे प्रश्नचिह्न भी खड़े हैं।
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वस्तुतः श्रीराम भारतीय संस्कृति के आदर्श हैं। तथा भारतीय संस्कृति के सबसे उदात्त चरित्र हैं। संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश तथा भारत की अन्य विभिन्न भाषाओं में अनेक राम कथाएं हैं और उन कथाओं के अपने अलग-अलग राम हैं। सबने अपने-अपने राम के अलग-अलग चित्र बनाए हैं। लेकिन, सबमें एक समरूपता है राम की उदात्त चेतना। सद्गुणों को धारण करने वाले वाले व्यक्ति का नाम जब वाल्मीकि पूछते हैं तब नारद उस व्यक्ति का खुलासा करते हुए ईक्ष्वाकुवंशी श्रीराम का नाम लेते हैं और यह भी बताते हैं कि यह नाम जन जन में व्याप्त है।
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मैं समझता हूं कि राम ऐतिहासिक पात्र हों अथवा काल्पनिक चरित्र, वह हमारी संस्कृति के प्रतीक पुरुष अवश्य हैं। हमारे जीवन का आदर्श हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। प्रत्येक संस्कृति के लिए ऐसे आदर्श चरित्र होने ही चाहिए। ऐसे सांस्कृतिक प्रतीकों को देखकर ही मनुष्य अपनी लघुताओं को समझ सकता है तथा अपने को संवार सकता है। इसीलिए राम आज हमारे लिए जीवन सत्य हैं, मनुष्यता के लिए आवश्यक आदर्श हैं तथा सर्वोच्च सांस्कृतिक प्रतीक हैं। - रविनंदन सिंह, साहित्यकार।