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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Pugilistic attitude' of the body is not proof that the person was burned alive; life imprisonment sentence

हाईकोर्ट  : शव की बॉक्सर जैसी आकृति व्यक्ति के जिंदा जलाने का सबूत नहीं, आजीवन कारावास की सजा बरकरार

Mon, 31 Aug 2026 04:26 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 31 Aug 2026 04:26 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जले शव का हाथ-पैर मुड़कर ‘बॉक्सर जैसी आकृति’ में आ जाना यह साबित नहीं करता कि व्यक्ति को जिंदा जलाया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तेज गर्मी से मांसपेशियों के सिकुड़ने से शव में यह आकृति बन सकती है।

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Pugilistic attitude' of the body is not proof that the person was burned alive; life imprisonment sentence
अदालत का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि जले शव का हाथ-पैर मुड़कर ‘बॉक्सर जैसी आकृति’ में आ जाना यह साबित नहीं करता कि व्यक्ति को जिंदा जलाया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तेज गर्मी से मांसपेशियों के सिकुड़ने से शव में यह आकृति बन सकती है। यह स्थिति व्यक्ति की मौत से पहले या बाद में जलाए जाने से दिखाई दे सकती है। कोर्ट ने अन्य चिकित्सकीय साक्ष्यों के आधार पर विवाहिता की मौत को एंटी-मॉर्टम बर्न यानी जीवित अवस्था में जलने का मामला माना।

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न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने अशोक कुमार की अपील खारिज कर उसकी दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी। अलीगढ़ निवासी अशोक ने जून 1982 में सुनीता से शादी की थी। आरोप था कि शादी के बाद अशोक व अन्य टीवी और बाइक की मांग करते थे। जुलाई 1986 को सुनीता के पिता जब गांव पहुंचे तो घर के अंदर सुनीता का आधा जला शव मिला। मामले में ट्रायल कोर्ट ने 1990 में याची को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की।
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कोर्ट ने पाया कि पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने शव को बॉक्सर पोजिशन में पाया था। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि इस मामले में बॉक्सर पोजिशन अकेला साक्ष्य नहीं था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जलने के घावों के किनारों पर लालिमा और गहरे एंटी-मॉर्टम बर्न मिले थे। कोर्ट ने बचाव पक्ष की दुर्घटनावश आग लगने की दलील को स्वीकार नहीं की। कोर्ट ने यह भी कहा कि सुनीता की मौत आरोपियों के घर के अंदर हुई थी। ऐसे में आरोपियों से अपेक्षा थी कि वे बताते कि सुनीता किस तरह जलीं। उनका स्पष्टीकरण अभियोजन के मामले को कमजोर करने में विफल रहा। कोर्ट ने अपील खारिज कर दोष सिद्धि और सजा बरकरार रखी।

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