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प्रियंका पर दांव लगाने से पीछे हट सकती है कांग्रेस
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Mon, 09 May 2016 01:57 AM IST
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प्रियंका गांधी प्रशांत किशोर
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यूपी के आगामी विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी को प्रचार की कमान सौंपे जाने की मांग को लेकर जिस तरह से सोशल साइट्स पर अभियान छेड़ा गया है, उससे दूसरे दलों में खलबली मची हुई है। हालांकि यह मांग पहले भी कई चुनावों में उठ चुकी है। हमेशा की तरह इस बार भी पार्टी में यह मुद्दा छाया हुआ है, लेकिन उम्मीद कम है कि पार्टी चुनाव में प्रियंका को प्रचार की कमान सौंपेगी। पार्टी के वरिष्ठ नेता मानते हैं कि कांग्रेस का मुख्य लक्ष्य 2019 का लोकसभा चुनाव है। अब यूपी में ही सभी घोडे़ दौड़ा दिए और सफलता नहीं मिली तो केंद्र की सत्ता में लौटना और कठिन हो जाएगा।
यूपी में 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले भी प्रियंका गांधी को पार्टी की कमान सौंपे जाने की मांग की गई थी। इसके बावजूद कांग्रेस ने पार्टी ने प्रियंका को अमेठी और रायबरेली तक ही सीमित रखा। इस बार के चुनाव करीब आए तो फिर पुरानी मांग ने जोर पकड़ लिया। वर्ष 2013 में तो कुछ कांग्रेसियों ने प्रियंका गांधी यूथ ब्रिगेड नाम से नया संगठन भी बना लिया। फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी प्रियंका गांधी को यूपी में प्रचार की कमान सौंपने की मांग को लेकर अभियान छेड़ दिया गया है।
कुछ कांग्रेसियों ने यह खबर भी फैला दी कि चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने भी प्रियंका के नाम का प्रस्ताव रखा है, लेकिन कांग्रेस ने अब तक इसकी आधिकारिक रूप से कोई पुष्टि नहीं की है। सिर्फ मांग के आधार पर ही कयास लगाए जा रहे हैं। कांग्रेस के प्रवेश प्रवक्ता किशोर वार्ष्णेय का कहना है कि पहले भी इस तरह की मांगें उठती रही हैं। कांग्रेस मुख्य लक्ष्य 2019 का लोकसभा चुनाव जीतकर सत्ता में वापसी करना है, सो उन्हें लगता कि पार्टी प्रियंका गांधी को यूपी में प्रचार की कमान सौंपेगी। यह काम पार्टी अगले लोकसभा चुनाव में कर सकती है।
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इन दिनों एक चर्चा तेजी से हो रही है कि कांग्रेस यूपी के विधानसभा चुनाव में प्रियंका या राहुल को मुख्य चेहरा बनाती है और दूसरी ओर भाजपा वरुण गांधी के नाम को आगे बढ़ाती है तो मुकाबला ‘गांधी बनाम गांधी’ हो जाएगा लेकिन यह मुद्दा अब तक कयासबाजी तक ही सीमित है। कुछ दिनों पहले कांग्रेस में इस चर्चा ने भी जोर पकड़ा कि पार्टी राहुल गांधी को मुख्यमंत्री प्रत्याशी के तौर पर सामने ला सकती है, पर राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस प्रदेश स्तर की राजनीति में राहुल गांधी का नाम प्रस्तावित नहीं करेगी। पार्टी राहुल को केंद्र की राजनीति में ही रखना चाहती है। प्रियंका गांधी के नाम को लेकर भी अभी सिर्फ चर्चा है। भाजपा ने भी वरुण गांधी को लेकर कोई संकेत नहीं दिए हैं। ऐसे में ‘गांधी बनाम गांधी’ फिलहाल मुश्किल नजर आ रहा है।
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यूपी में 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले भी प्रियंका गांधी को पार्टी की कमान सौंपे जाने की मांग की गई थी। इसके बावजूद कांग्रेस ने पार्टी ने प्रियंका को अमेठी और रायबरेली तक ही सीमित रखा। इस बार के चुनाव करीब आए तो फिर पुरानी मांग ने जोर पकड़ लिया। वर्ष 2013 में तो कुछ कांग्रेसियों ने प्रियंका गांधी यूथ ब्रिगेड नाम से नया संगठन भी बना लिया। फेसबुक, ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी प्रियंका गांधी को यूपी में प्रचार की कमान सौंपने की मांग को लेकर अभियान छेड़ दिया गया है।
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कुछ कांग्रेसियों ने यह खबर भी फैला दी कि चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने भी प्रियंका के नाम का प्रस्ताव रखा है, लेकिन कांग्रेस ने अब तक इसकी आधिकारिक रूप से कोई पुष्टि नहीं की है। सिर्फ मांग के आधार पर ही कयास लगाए जा रहे हैं। कांग्रेस के प्रवेश प्रवक्ता किशोर वार्ष्णेय का कहना है कि पहले भी इस तरह की मांगें उठती रही हैं। कांग्रेस मुख्य लक्ष्य 2019 का लोकसभा चुनाव जीतकर सत्ता में वापसी करना है, सो उन्हें लगता कि पार्टी प्रियंका गांधी को यूपी में प्रचार की कमान सौंपेगी। यह काम पार्टी अगले लोकसभा चुनाव में कर सकती है।
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इन दिनों एक चर्चा तेजी से हो रही है कि कांग्रेस यूपी के विधानसभा चुनाव में प्रियंका या राहुल को मुख्य चेहरा बनाती है और दूसरी ओर भाजपा वरुण गांधी के नाम को आगे बढ़ाती है तो मुकाबला ‘गांधी बनाम गांधी’ हो जाएगा लेकिन यह मुद्दा अब तक कयासबाजी तक ही सीमित है। कुछ दिनों पहले कांग्रेस में इस चर्चा ने भी जोर पकड़ा कि पार्टी राहुल गांधी को मुख्यमंत्री प्रत्याशी के तौर पर सामने ला सकती है, पर राजनैतिक विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस प्रदेश स्तर की राजनीति में राहुल गांधी का नाम प्रस्तावित नहीं करेगी। पार्टी राहुल को केंद्र की राजनीति में ही रखना चाहती है। प्रियंका गांधी के नाम को लेकर भी अभी सिर्फ चर्चा है। भाजपा ने भी वरुण गांधी को लेकर कोई संकेत नहीं दिए हैं। ऐसे में ‘गांधी बनाम गांधी’ फिलहाल मुश्किल नजर आ रहा है।