पं.जसराज के लिए दूसरा घर था प्रयागराज
जानेमाने शास्त्रीय गायक पद्मविभूषण पं.जसराज का जाना संगमनगरी के साहित्य और संगीत जगत को आहत कर गया है। उन्हें प्रयागराज से इतना लगाव था कि कभी आयोजनों के आमंत्रण तो कभी साहित्य और संगीत के मित्रों से मिलने के लिए उनका यहां आना-जाना लगा रहा। कभी वह साहित्य मनीषी केशव चंद्र वर्मा तो कभी पं.शांताराम विष्णु कशालकर के यहां ठहरते थे। कह सकते हैं, प्रयागराज उनका दूसरा घर था।
प्रयागराज में शास्त्रीय संगीत की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए केशवचंद्र वर्मा और शांताराम विष्णु कशालकर आदि की पहल पर केशवचंद्र वर्मा की पत्नी सरोजिनी वर्मा ने संस्था रागरंजन की स्थापना की। इसी के बैनर तले पहली बार वर्ष 1968 में साहित्य सम्मेलन के लाइब्रेरी हाल में उनका एक बड़ा कार्यक्रम हुआ था जो बहुत यादगार रहा। इसके बाद तो उनका यहां आने का सिलसिला शुरू हो गया। संगीत समिति के अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन सहित सांस्कृतिक केंद्र के ‘चलो मन गंगा यमुना तीर’ में वर्ष 2010 के दौरान वह सांस्कृतिक केंद्र के कार्यक्रम में आए थे।
केशव चंद्र वर्मा की बेटी प्रोफेसर वंदिता वर्मा कहती हैं, वह हमारे परिवार के सदस्य जैसे थे। पिता जी की पहली पुण्यतिथि पर वर्ष वह वर्ष 2008 में संगीत समिति में हुए कार्यक्रम में आए थे। वह विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह सहित सरोजिनी नायडू छात्रावास के कार्यक्रम में भी आए थे। बीच-बीच में कई बार आते थे। संभवत: वह वर्ष 2018 में किसी कार्यक्रम में वाराणसी जाते वक्त यहां कुछ घंटों के लिए रुके थे। बेटी की तरह मानने वाले पं.जसराज ने अपने सबसे प्रिय शिष्य गिरीश बजलवार जी से मेरा विवाह कराया।
वह इतने सहज थे कि एक बार रिक्शे से अकेले ही प्रयाग संगीत समिति चले गए। वहां पहुंचने पर गार्ड ने उन्हें रोक दिया। उन्होंने कहा, मेरा कार्यक्रम है, मैं ही पं.जसराज हूं। फिर भी गार्ड नहीं माना, बोला, चलिए चलिए सभी ऐसे ही कहते हैं। इस बीच समिति के किसी अधिकारी ने उन्हें पहचाना और आदरपूर्वक भीतर ले गया। उन्हें रसमलाई बहुत पसंद थी लेकिन, वह अपनी तबीयत का बहुत ख्याल रखते थे।
श्रोताओं में महादेवी भी थीं शामिल
पं.जसराज को याद करते हुए गीतकार यश मालवीय ने कहा, पं.जसराज का यहां के साहित्य और संगीत जगत से करीबी नाता रहा। केशवचंद्र वर्मा जी सहित श्री लाल शुक्ल, नरेश मेहता, डॉ.जगदीश गुप्त, शांताराम विष्णु कशालकर, लक्ष्मीकांत वर्मा आदि उनके श्रोताओं में शामिल होते थे। एक बात तो महादेवी के सामने उन्होेंने उनकी रचना का गायन किया था। महादेवी जी को उनकी अर्थपूर्ण बंदिशें बहुत अच्छी लगती थीं। प्रो.अनिता गोपेश ने कहा, पं.जसराज बहुत सहजता से प्रयागराज के हर कार्यक्रम में शामिल होते और अपनी अमिट छाप छोड़ जाते थे। उनका जाना दुखद है।रंगनिर्देशक प्रवीण शेखर ने कहा, पंडित जसराज हिंदुस्तानी कंठ संगीत के शिखर पुरुष थे। उनसे मिलने और उन्हें सुनने के बहुतेरे अवसर अब मेरी सांस्कृतिक निधि है। वंदिता जी के घर वह संगीत रसिकों से अनौपचारिक भेंट में घंटों बतियाते, गाते रहते थे। इलाहाबाद उन्हें बहुत प्रिय था। संगीत समिति और माघ मेले में उन्हें बहुत बार सुना। स्पिक मैके की कोआर्डिनेटर डॉ.मधु शुक्ला ने कहा, प्रयागराज के संगीत जगत को वह समृद्ध करते रहे। उनका जाना दुखद है।
गायक मनोज गुप्ता बोले, उनका जाना आहत कर गया है। यह संगीत प्रेमियों के लिए गहरा आघात है। प्रयागराज के अनेक कार्यक्रमों में उन्हें सुनने, उनके साथ रहने का सौभाग्य मिला। वह कहते थे, विनम्र बने रहिए। रियाज करते रहो आवाज निखरती जाएगी। उनकी आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना है।