हत्या के अपराध में उम्रकैद की सजा पाए अभियुक्त को हाईकोर्ट ने किया बरी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि हत्या जैसे गंभीर प्रकृति के अपराधों का विचारण करते और सजा सुनाते समय साक्ष्यों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करना जरूरी है। अपराध की गंभीरता मात्र सजा देने का आधार नहीं हो सकती है। कोर्ट ने हत्या के अपराध में उम्रकैद की सजा पाए कानपुर देहात के अरविंद सिंह को हत्या के आरोपों से बरी कर दिया है।
कोर्ट ने कहा कि अभियुक्त अपीलार्थी पर लगाए गए आरोप उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर संदेह से परे साबित नहीं होते हैं। यहां साक्ष्यों के बेहद बारीकी से विश्लेषण की आवश्यकता है। अपील पर न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने सुनवाई की।
मामले के अनुसार कानपुर देहात क्षेत्र के रूरा थाना के नजदीक 24 अगस्त 1988 को कृष्ण बिहारी दीक्षित के बेटे आदित्य की कुल्हाड़ी और गड़ासे से मार कर हत्या कर दी गई। घटना रात करीब पौने नौ बजे की थी। उस वक्त गश्त पर निकले होमगार्ड मुन्ना सिंह, घसीटे लाल, पंचम लाल और गोविंद सिंह ने इस घटना को अपनी आंखों से देखा।
बचाओ-बचाओ की आवाज सुनकर वह लोग घटनास्थल पर पहुंचे तो दो लोगों को कुल्हाड़ी तथा गड़ासे आदित्य को मारते देखा। होमगार्डों को देखकर अभियुक्तगण मौके से भाग गए। होमगार्ड मुन्ना सिंह ने अज्ञात में रिपोर्ट लिखाई। उसने बताया कि उसने अभियुक्तों को टार्च और बिजली की रोशनी में देखा है तथा सामने आने पर पहचान सकता है।
विवेचना में पुलिस ने अरविंद सिंह, बुबुआ और सुनील सिंह के खिलाफ आरोप पत्र पेश किया। मुकदमे की सुनवाई के दौरान बबुआ फरार हो गया इसलिए उसकी फाइल अलग कर दी गई जबकि सुनील सिंह को ट्रायल कोर्ट ने हत्या और आपराधिक षडयंत्र के आरोप से बरी कर दिया।
वादी मुकदमा होमगार्ड मुन्ना सिंह पक्षद्रोही हो गया। उसने कहा कि घटना के वक्त बारिश हो रही थी और अंधेरा था। पुलिस जांच में हत्या करने का उद्देश्य साबित नहीं होता है। दोनों पक्षों के बीच किसी प्रकार की दुश्मनी, गुटबाजी या लड़ाई झगड़े की बात सामने नहीं आई है। पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त हथियार गड़ासा और कुल्हाड़ी भी बरामद नहीं किया है। ऐसे में अभियुक्त पर लगाए गए आरोप संदेह से परे साबित नहीं होते हैं।