यूपी : एससी-एसटी एक्ट में 22 पुलिसकर्मियों पर एफआईआर का आदेश रद्द, हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
सरकारी ड्यूटी के दौरान पुलिसकर्मियों पर लगे आरोपों में एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से पहले मामले की सावधानीपूर्वक जांच जरूरी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज के उप निरीक्षक समेत 22 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के विशेष अदालत के आदेश को रद्द करते हुए प्रदेश के न्यायिक अधिकारियों को अहम निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिकायत पर न्यायिक आदेश देने से पहले पुलिस का पक्ष और वैधानिक प्रक्रिया भी देखी जानी चाहिए।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकारी कर्मचारी पर ड्यूटी के दौरान आरोप लगने पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से पहले मामले की सावधानीपूर्वक जांच जरूरी है। हालांकि, इस प्रक्रिया को मिनी ट्रायल में नहीं बदला जा सकता। इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने महाराजगंज के उप निरीक्षक (एसआई) समेत 22 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के विशेष अदालत के आदेश को रद्द कर दिया।
घुघुली थाने में तैनात उप निरीक्षक राकेश कुमार यादव की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए कोर्ट ने प्रदेश के सभी न्यायिक अधिकारियों को निर्देश दिया कि एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से पहले पुलिस का पक्ष और वैधानिक प्रक्रिया पर विचार करें। कोर्ट ने जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को मासिक बैठकों में इन निर्देशों के अनुपालन की निगरानी करने का भी आदेश दिया। साथ ही, फैसले की प्रति न्यायिक अधिकारियों, जेटीआरआई (लखनऊ), जिलाधिकारियों, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों (एसएसपी), पुलिस अधीक्षकों (एसपी) और पुलिस आयुक्तों को भेजने का निर्देश दिया।
दो महिलाओं ने अभद्रता का लगाया था आरोप
बसंतपुर गांव की दो महिलाओं ने आरोप लगाया था कि छह जून की रात बिना महिला पुलिसकर्मियों के उप निरीक्षक राकेश कुमार यादव, आरक्षी अमित कुमार और करीब 20 अन्य पुलिसकर्मी तलाशी के लिए उनके घर में घुस गए थे। उनके पास तलाशी वारंट भी नहीं था। महिलाओं का आरोप था कि पुलिसकर्मियों ने उनके साथ अभद्रता की, उन्हें शौचालय जाने से रोका और जातिसूचक टिप्पणियां कीं।
महिलाओं के मुताबिक, 12 जून को पुलिस अधीक्षक से शिकायत करने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई तो उन्होंने विशेष अदालत का रुख किया। इस पर 11 अगस्त को महाराजगंज की एससी-एसटी एक्ट की विशेष अदालत ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। पुलिसकर्मियों ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
अपीलकर्ताओं के अधिवक्ता ने दलील दी कि पुलिसकर्मी अपने सरकारी दायित्व का निर्वहन कर रहे थे। घटना से संबंधित दो परस्पर विरोधी मामले पहले ही दर्ज थे और उनमें आरोपपत्र दाखिल हो चुके थे। ऐसे में पुलिसकर्मियों के खिलाफ की गई नई शिकायत जवाबी कार्रवाई थी।
हाईकोर्ट ने पाया कि विशेष अदालत के न्यायाधीश ने अपने आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया कि मामले में जांच जरूरी क्यों नहीं थी। अदालत की ओर से मंगाई गई पुलिस रिपोर्ट पर भी विचार नहीं किया गया था।
कोर्ट ने गिरफ्तारी और जनरल डायरी (जीडी) में दर्ज प्रविष्टि को पुलिसकर्मियों की मौजूदगी और उनकी ड्यूटी के बीच प्रथम दृष्टया संबंध का संकेत माना। कोर्ट के अनुसार, विशेष अदालत को शिकायतकर्ता के परिवार और पुलिसकर्मियों से जुड़े पुराने मुकदमों पर भी विचार करना चाहिए था।
धारा 173(4) शिकायत का उपाय, एफआईआर का सीधा आदेश देने का आधार नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 173(4) पुलिस अधीक्षक के समक्ष शिकायत करने का वैधानिक उपाय उपलब्ध कराती है। इस प्रावधान के तहत अर्जी दाखिल करने मात्र से विशेष अदालत को एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने का अधिकार नहीं मिल जाता। जांच का न्यायिक निर्देश देने की शक्ति धारा 175(3) में निहित है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले में जांच का आदेश देने की प्रक्रिया को मिनी ट्रायल नहीं बनाया जा सकता।