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वैज्ञानिकों ने खोजा कीमोथेरेपी का विकल्प
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Wed, 28 Mar 2018 12:34 AM IST
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कैंसर के इलाज में कारगर प्रक्रिया
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वैज्ञानिकों को एक बड़ी उपलब्धि हाथ लगी है। उन्होंने कैंसर के इलाज में कीमोथेरेपी और उन दवाओं का विकल्प खोज लिया है, जो कैंसर के इलाज के दौरान कैंसर सेल्स के साथ सामान्य सेल्स को भी नुकसान पहुंचाती हैं। वैज्ञानिकों ने चूहों पर सफल प्रयोग किया है। हालांकि इसे मानव शरीर पर लागू करने में अभी काफी वक्त है लेकिन पहले ही पायदान पर प्रयोग को सफलता मिलने से वैज्ञानिक उत्साहित हैं। यह सफल प्रयोग 11 वैज्ञानिकों की टीम ने क्लेवलैंड क्लीनिक, अमेरिका में किया गया, जो विश्व में दूसरे स्थान पर है।
वैज्ञानिकों की टीम का नेतृत्व क्लेवलैंड क्लीनिक में कैंसर बायोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. यांग ली ने किया, जो पिछले इलाहाबाद विश्वविद्यालय आए थे और यहां साल सात से 14 जुलाई तक कैंसर जागरूकता कार्यक्रम के तहत उनके कई लेक्चर भी आयोजित किए गए थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जैव रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. मुनीश भी इस टीम का हिस्सा रहे। इस रिसर्च को औंको जीन नामक प्रतिष्ठित जरनल में पब्लिशर नेचर स्प्रिंग की ओर से प्रकाशित किया गया है। डॉ. मुनीश ने बताया कि कैंसर की बीमारी से शरीर में ट्यूमर बन जाते हैं। कीमोथेरेपी और दवाओं के जरिये इन ट्यूमर्स को खत्म किया जाता है। इलाज की इस प्रक्रिया में कैंसर सेल्स के साथ सामान्य सेल्स को भी नुकसान होता है। शरीर पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
मरीज को भी काफी पीड़ा होती है। वैज्ञानिकों की टीम ने रिसर्च में पाया कि माइक्रो आरएनए यानी एमआईआर-21 नार्मल सेल्स को खत्म करता है। इससे कैंसर सेल्स और प्रभावशाली हो जाती हैं। टीम ने चूहों पर प्रयोग करते हुए एमआईआर-21 को प्रभावहीन बनाने के लिए उसका एंटी सेंस चूहे में इंजेक्ट दिया और पाया कि चूहे के शरीर में बना ट्यूमर धीमे-धीमे छोटा हो गया और कुछ ट्यूमर पूरी तरह से खत्म हो गए। इस प्रक्रिया में सामान्य सेल को कोई नुकसान नहीं हुआ और न ही चूहे के शरीर पर किसी तरह का नकारात्मक प्रभाव पड़ा। यह प्रयोग साल भर तक अमेरिका के क्लेवलैंड क्नीनिक में चला। हालांकि अभी मानव शरीर पर इस प्रयोग नहीं हुआ है। इसे व्यवहारिक रूप से लागू करने में तकरीबन दस वर्ष का समय लग सकता है।
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डॉक्टरों को भी आना होगा आगे
डॉ. मुनीश ने बताया कि विदेशों में रिसर्च इसलिए सफल हो रहे हैं, क्योंकि वहां वैज्ञानिक और चिकित्सक साथ मिलकर काम कर रहे हैं। यहां भी चिकित्सकों को आगे आना चाहिए। जब तक वैज्ञानिकों और चिकित्सकों के बीच सामंजस्य नहीं होगा, तब तक रिसर्च के क्षेत्र में तेजी के साथ सफलतापूर्वक आगे बढ़ पाना मुश्किल है, क्योंकि दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं।
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वैज्ञानिकों की टीम का नेतृत्व क्लेवलैंड क्लीनिक में कैंसर बायोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. यांग ली ने किया, जो पिछले इलाहाबाद विश्वविद्यालय आए थे और यहां साल सात से 14 जुलाई तक कैंसर जागरूकता कार्यक्रम के तहत उनके कई लेक्चर भी आयोजित किए गए थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जैव रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. मुनीश भी इस टीम का हिस्सा रहे। इस रिसर्च को औंको जीन नामक प्रतिष्ठित जरनल में पब्लिशर नेचर स्प्रिंग की ओर से प्रकाशित किया गया है। डॉ. मुनीश ने बताया कि कैंसर की बीमारी से शरीर में ट्यूमर बन जाते हैं। कीमोथेरेपी और दवाओं के जरिये इन ट्यूमर्स को खत्म किया जाता है। इलाज की इस प्रक्रिया में कैंसर सेल्स के साथ सामान्य सेल्स को भी नुकसान होता है। शरीर पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
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मरीज को भी काफी पीड़ा होती है। वैज्ञानिकों की टीम ने रिसर्च में पाया कि माइक्रो आरएनए यानी एमआईआर-21 नार्मल सेल्स को खत्म करता है। इससे कैंसर सेल्स और प्रभावशाली हो जाती हैं। टीम ने चूहों पर प्रयोग करते हुए एमआईआर-21 को प्रभावहीन बनाने के लिए उसका एंटी सेंस चूहे में इंजेक्ट दिया और पाया कि चूहे के शरीर में बना ट्यूमर धीमे-धीमे छोटा हो गया और कुछ ट्यूमर पूरी तरह से खत्म हो गए। इस प्रक्रिया में सामान्य सेल को कोई नुकसान नहीं हुआ और न ही चूहे के शरीर पर किसी तरह का नकारात्मक प्रभाव पड़ा। यह प्रयोग साल भर तक अमेरिका के क्लेवलैंड क्नीनिक में चला। हालांकि अभी मानव शरीर पर इस प्रयोग नहीं हुआ है। इसे व्यवहारिक रूप से लागू करने में तकरीबन दस वर्ष का समय लग सकता है।
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डॉक्टरों को भी आना होगा आगे
डॉ. मुनीश ने बताया कि विदेशों में रिसर्च इसलिए सफल हो रहे हैं, क्योंकि वहां वैज्ञानिक और चिकित्सक साथ मिलकर काम कर रहे हैं। यहां भी चिकित्सकों को आगे आना चाहिए। जब तक वैज्ञानिकों और चिकित्सकों के बीच सामंजस्य नहीं होगा, तब तक रिसर्च के क्षेत्र में तेजी के साथ सफलतापूर्वक आगे बढ़ पाना मुश्किल है, क्योंकि दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं।