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हाईकोर्ट : सिर्फ लंबित आपराधिक मामला नहीं हो सकता शस्त्र लाइसेंस के निरस्तीकरण का आधार

Thu, 20 Jul 2023 01:07 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 20 Jul 2023 01:07 PM IST
सार

हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि जब तक सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्पष्ट निष्कर्ष नहीं दर्ज किया जाता कि याची के कब्जे वाले शस्त्र से सार्वजनिक शांति और मानव जीवन को खतरा है, तब तक शस्त्र लाइसेंस को निरस्त किया जाना आर्म्स एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन होगा।

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Only pending criminal case cannot be the basis for cancellation of arms license
इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही किसी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक मामला लंबित हो, उसका शस्त्र लाइसेंस तब तक निरस्त नहीं किया जा सकता, जब तक कि समाज में उसके शांति विरोधी आचरण के पुष्ट साक्ष्य उपलब्ध न हों। यह आदेश उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने एटा जिले के याची राम विलास की ओर से शस्त्र लाइसेंस निरस्तीकरण के अपीलीय आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को स्वीकार करते हुए दिया।

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याची के अधिवक्ता अनूप कुमार मिश्रा ने दलील दी कि याची के बंदूक का लाइसेंस केवल इस आधार पर निरस्त कर दिया गया कि उसके विरुद्ध हत्या का मुकदमा दर्ज है। हत्या के इस मामले में उसकी बंदूक की कोई भूमिका नहीं थी। याची दोषमुक्त भी हो चुका है। सक्षम प्राधिकारी ने अपने आदेश में भी ऐसे किसी तथ्य या साक्ष्य का जिक्र नहीं किया है, जिससे यह साबित हो कि याची ने कभी समाज में शांति व्यवस्था को बिगाड़ने के लिए अपनी लाइसेंसी बदूंक का इस्तेमाल किया हो।
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हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि जब तक सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्पष्ट निष्कर्ष नहीं दर्ज किया जाता कि याची के कब्जे वाले शस्त्र से सार्वजनिक शांति और मानव जीवन को खतरा है, तब तक शस्त्र लाइसेंस को निरस्त किया जाना आर्म्स एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन होगा।
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कोर्ट ने कहा कि याची के मामले में सक्षम प्राधिकारी और अपीलीय अधिकारी द्वारा पारित आदेश आशंकाओं और कल्पनाओं पर आधारित है। कोर्ट ने याची के शस्त्र निरस्तीकरण के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने जिलाधिकारी एटा को निर्देशित भी किया है कि याची के शस्त्र लाइसेंस बहाली संबंधी प्रत्यावेदन को विधिसम्मत तरीके से दो माह में निस्तारित करें। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रत्यावेदन पूर्व में पारित आदेशों और लंबित आपराधिक मामलाें के कारण कतई न निरस्त किया जाए।

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