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सूखे से निपटने के लिए नहीं बनी कार्ययोजना
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Tue, 12 Apr 2016 02:52 AM IST
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यमुनापार में कोरांव, मेजा और बारा तहसील में सूखे के कारण पेयजल का जबर्दस्त संकट उत्पन्न हो गया है। कुंए, तालाब सूख चुके हैं, भूजल स्तर नीचे जाने से हैंडपंप भी किसी काम के नहीं रह गए। बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे ग्रामीणों को अपनी प्यास बुझाने के लिए कोसों दूर जाना पड़ रहा है और प्रशासन सूखे से निपटने के लिए अब तक कोई कार्ययोजना नहीं बना सका है। खानापूरी के लिए सूखे को लेकर दो-तीन बैठकें हुई हैं और तहसील प्रशासन की डिमांड पर सिर्फ बारा तहसील में पानी के 15 टैंकर भेजे गए हैं।
यमुनापार के पठारी इलाकों में हर साल यही स्थिति होती है। ऐसे हालात से निपटने के लिए पहले से कोई बजट नहीं होता, सो प्रशासन भी ग्रामीणों को उनके हाल पर छोड़ देता है। ऐसे इलाकों में टैंकर आदि भेजने पर जो खर्च आता है, बाद में बिल प्रस्तुत करने पर शासन स्तर से उसका भुगतान होता है। सूखे से निपटने के लिए हर साल 30 अप्रैल तक कार्ययोजना तैयार करनी होती है। इस बार गर्मी ने समय से पहले दस्तक दी। हालांकि इस बार बारिश की जो हालत रही, उसे देखते ही पहले ही अनुमान लगा लिया गया था कि पिछले वर्षों के मुकाबले इस बार सूखे से हालात और बदतर हो सकते हैं।
इसके बावजूद प्रशासन नहीं चेता और अफसर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। सूत्रों का कहना है कि बारा तहसील में पानी के 15 टैंकर लगा दिए गए हैं, लेकिन कोरांव और मेजा तहसील प्रशासन की ओर से टैंकरों के लिए अब तक डिमांड भी नहीं भेजी गई है जबकि इन दोनों तहसीलों लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। हालांकि सूखे से निपटने के लिए कागजों में चौकियां स्थापित कर दी गई हैं। ग्रामीण इलाकों में संपन्न लोगों से कहा गया है कि मानवता के आधार पर ग्रामीणों को निजी नलकूप इस्तेमाल करने की इजाजत दें। कुछ स्वयं सेवी संगठनों को भी पत्र जारी कर सूखे की स्थिति में सहयोग मांगा गया है। इसके अलावा विकास विभाग के सभी बीडीओ को भी पत्र लिखा गया है। इसके बावजूद हालात और बदतर होते जा रहे हैं। स्थिति से निपटने के लिए प्रशासन ने अब तक कोई ठोस कार्ययोजना तैयार नहीं की है। तैयारी सिर्फ कागजों में ही नजर आ रही है और यमुनापार का बड़े हिस्से में पानी के लिए हाहाकार मचा है।
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यमुनापार के पठारी इलाकों में हर साल यही स्थिति होती है। ऐसे हालात से निपटने के लिए पहले से कोई बजट नहीं होता, सो प्रशासन भी ग्रामीणों को उनके हाल पर छोड़ देता है। ऐसे इलाकों में टैंकर आदि भेजने पर जो खर्च आता है, बाद में बिल प्रस्तुत करने पर शासन स्तर से उसका भुगतान होता है। सूखे से निपटने के लिए हर साल 30 अप्रैल तक कार्ययोजना तैयार करनी होती है। इस बार गर्मी ने समय से पहले दस्तक दी। हालांकि इस बार बारिश की जो हालत रही, उसे देखते ही पहले ही अनुमान लगा लिया गया था कि पिछले वर्षों के मुकाबले इस बार सूखे से हालात और बदतर हो सकते हैं।
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इसके बावजूद प्रशासन नहीं चेता और अफसर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। सूत्रों का कहना है कि बारा तहसील में पानी के 15 टैंकर लगा दिए गए हैं, लेकिन कोरांव और मेजा तहसील प्रशासन की ओर से टैंकरों के लिए अब तक डिमांड भी नहीं भेजी गई है जबकि इन दोनों तहसीलों लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। हालांकि सूखे से निपटने के लिए कागजों में चौकियां स्थापित कर दी गई हैं। ग्रामीण इलाकों में संपन्न लोगों से कहा गया है कि मानवता के आधार पर ग्रामीणों को निजी नलकूप इस्तेमाल करने की इजाजत दें। कुछ स्वयं सेवी संगठनों को भी पत्र जारी कर सूखे की स्थिति में सहयोग मांगा गया है। इसके अलावा विकास विभाग के सभी बीडीओ को भी पत्र लिखा गया है। इसके बावजूद हालात और बदतर होते जा रहे हैं। स्थिति से निपटने के लिए प्रशासन ने अब तक कोई ठोस कार्ययोजना तैयार नहीं की है। तैयारी सिर्फ कागजों में ही नजर आ रही है और यमुनापार का बड़े हिस्से में पानी के लिए हाहाकार मचा है।
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