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नई कहानी के लिए गहरा आघात है जमाली का जाना
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Wed, 22 Jun 2016 01:31 AM IST
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जाने माने कथाकार सतीश जमाली नही रहे। उनके जाने से साहित्य जगत में शोक की लहर है। सतीश जमाली का इलाहाबाद से गहरा नाता रहा। कुछ समय पहले वह अपने बेटे के पास कानपुर चले गए थे। वहां अस्वस्थ हुए तो दिल्ली में एम्स में उनकी भर्ती कराया गया। मंगलवार को वहीं उनका निधन हो गया। भले ही उनका अंतिम समय कानपुर में बीता लेकिन मन में उनके इलाहाबाद ही रहा।
वरिष्ठ कवि और जनसंस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि सतीश जमाली इलाहाबाद के कथाकारों में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते थे। वह कई वर्षों तक श्रीपत राय की प्रसिद्ध पत्रिका ‘कहानी’ में संपादकीय सहयोगी रहे। बाद में कहानी पत्रिका दिल्ली से निकलने लगी। सतीश जमाली ने तब स्वतंत्र लेखन करते हुए अपना एक प्रकाशन ‘चित्रलेखा प्रकाशन’ के नाम से शुरू किया और ‘नई कहानी’ के नाम से पत्रिका भी निकाली। जिसमें प्रसिद्ध लेखकों की चर्चित रचनाएं भी छपी। प्रो. कुमार ने बताया कि उनकी पहली कविता पुस्तक ‘ऋण गुणा ऋण’ उन्होंने ही छापी थी। सतीश जमाली, विद्याधर शुक्ल और सत्यप्रकाश की त्रयी साथ-साथ सक्रिय रहती थी। विद्याधर शुक्ल और सत्यप्रकाश मिश्र तो पहले ही इलाहाबाद को सूना कर दुनिया से चले गए थे, अब जमाली भी नहीं रहे। अक्सर वे कानपुर से मुझे फोन करते थे कि वो इलाहाबाद आना चाहते हैं।
प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष प्रो. संतोष भदौरिया का कहना है कि सतीश जमाली कहानी आंदोलन से निकले हुए गंभीर और महत्वपूर्ण कथाकार थे। उन्होेंने हिंदी साहित्य को अपनी कहानियों से चमत्कृत किया। युवाओं को वह हमेशा लेखन के लिए प्रोत्साहित करते थे। अपने अंतिम समय तक वह इलाहाबाद को याद करते रहे। उनका जाना हिंदी साहित्य और इलाहाबाद के लिए बड़ी क्षति है। वरिष्ठ साहित्यकार अजामिल व्यास का कहना है कि सतीश जमाली 70-80 के दशक के प्रथम पंक्ति के रचनाकार थे। नये लेखक उनका अनुकरण करते थे। वह एक प्रयोगधर्मी रचनाकार तो थे ही भाषा शैली में भी उनका कोई सानी नहीं था। उनकी कहानियाें का विषय मध्यम वर्ग के लोगों की जिंदगी से जुड़ा हुआ ही रहता था। उन्होंने हमेशा समाज को बेहतर बनाने की दिशा में लिखा। वह न तो कभी लेखन की दौड़ में शामिल हुए और न ही कभी किसी विचारधारा में बंध कर लिखा। वरिष्ठ कवि नंदल हितैषी ने कहा कि सतीश जमाली ने नई कहानी को नई दिशा दी। उनका जाना हिंदी कहानी और इलाहाबाद के लिए बेहद दुखद है।
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वरिष्ठ कवि और जनसंस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि सतीश जमाली इलाहाबाद के कथाकारों में अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते थे। वह कई वर्षों तक श्रीपत राय की प्रसिद्ध पत्रिका ‘कहानी’ में संपादकीय सहयोगी रहे। बाद में कहानी पत्रिका दिल्ली से निकलने लगी। सतीश जमाली ने तब स्वतंत्र लेखन करते हुए अपना एक प्रकाशन ‘चित्रलेखा प्रकाशन’ के नाम से शुरू किया और ‘नई कहानी’ के नाम से पत्रिका भी निकाली। जिसमें प्रसिद्ध लेखकों की चर्चित रचनाएं भी छपी। प्रो. कुमार ने बताया कि उनकी पहली कविता पुस्तक ‘ऋण गुणा ऋण’ उन्होंने ही छापी थी। सतीश जमाली, विद्याधर शुक्ल और सत्यप्रकाश की त्रयी साथ-साथ सक्रिय रहती थी। विद्याधर शुक्ल और सत्यप्रकाश मिश्र तो पहले ही इलाहाबाद को सूना कर दुनिया से चले गए थे, अब जमाली भी नहीं रहे। अक्सर वे कानपुर से मुझे फोन करते थे कि वो इलाहाबाद आना चाहते हैं।
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प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष प्रो. संतोष भदौरिया का कहना है कि सतीश जमाली कहानी आंदोलन से निकले हुए गंभीर और महत्वपूर्ण कथाकार थे। उन्होेंने हिंदी साहित्य को अपनी कहानियों से चमत्कृत किया। युवाओं को वह हमेशा लेखन के लिए प्रोत्साहित करते थे। अपने अंतिम समय तक वह इलाहाबाद को याद करते रहे। उनका जाना हिंदी साहित्य और इलाहाबाद के लिए बड़ी क्षति है। वरिष्ठ साहित्यकार अजामिल व्यास का कहना है कि सतीश जमाली 70-80 के दशक के प्रथम पंक्ति के रचनाकार थे। नये लेखक उनका अनुकरण करते थे। वह एक प्रयोगधर्मी रचनाकार तो थे ही भाषा शैली में भी उनका कोई सानी नहीं था। उनकी कहानियाें का विषय मध्यम वर्ग के लोगों की जिंदगी से जुड़ा हुआ ही रहता था। उन्होंने हमेशा समाज को बेहतर बनाने की दिशा में लिखा। वह न तो कभी लेखन की दौड़ में शामिल हुए और न ही कभी किसी विचारधारा में बंध कर लिखा। वरिष्ठ कवि नंदल हितैषी ने कहा कि सतीश जमाली ने नई कहानी को नई दिशा दी। उनका जाना हिंदी कहानी और इलाहाबाद के लिए बेहद दुखद है।
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