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गंगा में स्नान, सरयू में ध्यान और गोदावरी में दान की महिमा

Tue, 03 Mar 2020 01:12 AM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Tue, 03 Mar 2020 01:12 AM IST
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morari bapu told the greatness of ganga sarayu and godavari
morari bapu told the greatness of ganga sarayu and godavari - फोटो : CITY DESK
गंगा में स्नान, सरयू में ध्यान और गोदावरी में ज्ञान की महिमा
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अरैल में संगम के तट पर रामकथा के कुंभ में गोता लगाने के लिए सोमवार उमड़े मानस प्रेमियों के बीच संत मोरारी बापू ने पवित्र नदियों की महिमा का बखान किया। बापू ने बताया कि गंगा में स्नान, यमुना जल के पान और सरस्वती के गान की संस्कृति रही है। जबकि, प्रभु राम की जन्म भूमि अयोध्या में सरयू के तट पर ध्यान करना चाहिए। सरयू में ध्यान, गोदावरी में ज्ञान और रेवा के तट पर दान की महिमा पुराणों में गाई गई है। उन्होंने देश-दुनिया से उमड़े मानस प्रेमियों से अपील की कि वह गंगा -यमुना में किसी तरह की गंदगी न फैलाएं। बल्कि इस पावन धारा को निर्मल बचाते हुए संस्कृति की रक्षा में कुंभ के समय या आम दिनों में भी श्रद्धालु गंगा और यमुना की पूजा करते हैं और पूजा सामग्री को जल में प्रवाहित कर देते हैं। ऐसा नहीं करना चाहिए।
संगीतमय ‘मानस अक्षयवट’ कथा के तीसरे दिन मोरारी बापू ने प्रेम-मिलन की संस्कृति को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि हमारी संस्कृति ही संगमी, यानी मिलन की है। ऐसे में सिर्फ प्रयाग ही नहीं, पूरा देश संगम है। रामकथा धर्म सभा नहीं, प्रेम सभा है। उन्होंने प्रकृति और ईश्वर से प्रेम की संस्कृति पर शेर पढ़ा- मोहब्बत करते हो तो आओ/ खुला है मोहब्बत का मयखाना...। चौपाईयों के संगीतमय गान पर रामकथा प्रेमी झूमते-नाचते रहे। मोरारीबापू ने याज्ञवल्क्य ऋषि ने जिस सती मोह की कथा को महर्षि भरद्वाज को सुनाया था, उस प्रसंग की चर्चा के साथ ही सत्संग के रूपों की भी विवेचना की। बताया कि सत्संग से व्यक्ति में शौर्य और धैर्य आता है। बापू ने कहा कि व्यक्ति को मन के साथ सत्संग करना चाहिए। हमारे संतों ने मन के साथ सत्संग किया है। हमें गुरु के द्वारा मिले हुए मंत्र से सत्संग करना चाहिए। उन्होंने बताया कि सत्संग अच्छे विचार से करना चाहिए। मंदिर में यानी किसी पवित्र स्थान पर बैठकर मूर्ति से सत्संग करना चाहिए। मां से सत्संग करो, यानी मां से शांति से वार्तालाप करना भी सत्संग है। हमें मौन से मुक्त होकर सत्संग करना चाहिए। यानी जहां कोई प्रतिबंध नहीं हो।
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मोरारी बापू ने मिलन की भूमि प्रयागराज में संगम तट पर अक्षयवट को युगों से अडिग रहने का प्रेरणास्रोत बताया। उन्होंने बताया कि जब प्रलयकाल में सबकुछ नष्ट हो गया था, तब भी अक्षयवट के इसी तरह हरा भरा बने रहने के प्रमाण मिलते हैं। जब चांद, सूरज और पृथ्वी भी नहीं बची थी, तब भी ‘अक्षयवट’ अक्षय था। पुराण बताते हैं कि इस आकाश में जितनी भी निहारिकाएं थीं, जो कुछ भी था, सब खत्म हो गया था, लेकिन तब भी अक्षयवट था और उसके एक पत्ते में प्रभु विश्राम कर रहे थे। इसीलिए अक्षयवट शाश्वत, चिरंतन और अविनाशी रूप में हमें प्रेरणा देने के लिए युगों-युगों से खड़ा है। राम चरित मानस में संत तुलसी दास ने अक्षयवट के स्पर्श की महिमा बताई है। अक्षयवट के पूजा का विधान नहीं है। सिर्फ दर्शन से ही पुण्य फल अर्जित हो जाता है। इसलिए अक्षयवट को निहारना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस कथा में लोग अक्षयवट को वाणी और श्रवण से स्पर्श कर रहे हैं।
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मोरारी बापू ने कहा कि किसी भी वस्तु को निहारने या आंखों से स्पर्श करने का भाव पुजारी का होना चाहिए। देखने वाली आंखें पुजारी वाली होनी चाहिए, शिकारी वाली नहीं। आंखें आरती वाली होनी चाहिए। अगर आंखें शिकारी वाली होंगी तो पतन भी कर सकती है। इंद्रियों के द्वार प्रबल होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को मर्यादा और संयम में रहना चाहिए। संयम गुरुकृपा और भक्ति से आता है।
अरैल में करीब पौने दो किमी क्षेत्रफल में फैला मोरारी बापू की अक्षयवट कथा का स्थल राममय हो गया है। सोमवार को हर माथे पर भांति-भांति के तिलक-त्रिपुंड नजर आए। कोई त्रिशूल की डिजाइन में तो कोई वैष्णवी त्रिपुंड लगाए घूमता रहा। किसी के माथे पर राधे-राधे तो किसी के गाल पर जयश्रीराम चंदन से उकेरा गया था। काशी केसरैयां से आए अमर बहादुर से चेहरे पर चंदन से राम नाम और राधे श्याम की डिजाइन बनवाने की रामकथा प्रेमियों में होड़ मची रही।
मोरारी बापू ने धर्मांचरण से बचने का भी संदेश दिया। कहा कि सबके धर्म, उपासना स्थलों और देवी-देवताओं की अपनी-महिमा है। उन्होंने सवा उठाया कि आखिर क्यों धर्मांतरण करवाते हो, क्यों देशांतर करवाते हो। वह सनातन संस्कृति की व्यापकता और ग्राह्यता को भी बताते हैं। कहते हैं कि हमारी शाखाओं पर झूलो, उस पर घोंसला बनाओ, लेकिन उनको काटने की चेष्टा मत करो।
‘मानस अक्षयवट’ कथा की व्यासपीठ सोमवार को एक जोड़े के सात फेरे लेने की रस्म की साक्षी भी बनी। देश-दुनिया से उमड़े मानस कथा प्रेमियों और राजनीतिक-सामाजिक हस्तियों के बीच व्यासपीठ पर खुशियों शहनाई गूंजी। बैंडबाजा बजा और व्यासपीठ से सामने ही जयमाल भी पड़ी।
कथा के विराम लेने के साथ ही बापू ने इस मंगल अवसर का जिक्र किया और शहनाई बजने लगी। मिराज ग्रुप के सीएमडी और कथा के आयोजक मदन पालीवाल की पुत्री माधवी पालीवाल ने विष्णु कांत व्यास के साथ व्यास पीठ के सात फेरे लिए। एक -दूसरे को वरमाला पहनाई।

इस दौरान बारात व्यासपीठ पर नाचते - गाते बैंड बाजे के साथ पहुंची थी। जयमाल के मौके पर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, सपत्नीक पूर्व काशी नरेश डॉ अनंत नारायण सिंह, टीवी कलाकार विपुल रॉय, रविंद्र जोशी, रूपेश व्यास, विकास पुरोहित, प्रकाश पुरोहित, मंत्रराज पालीवाल मौजूद थे। महामंडलेश्वर संतोष दास सतुआ बाबा ने मोरारी बापू की कथा के संगतकारों और बैंडपार्टी के कलाकारों को नेग भी दिया। इस दौरान मोरारी बापू ने वंचितों, दलितों, गरीबों की बेटियों की व्यास पीठ पर शादी कराने की अपील की। उन्होंने कहा कि आसपास के जितने भी वंचित, दलित, नाविक हों, उनकी बेटियों की शादी व्यासपीठ के सामने होनी चाहिए। दूल्हा-दुल्हन व्यासपीठ के आगे माला पहनाकर दांपत्य जीवन की शुरुआत करे। उन्होंने कहा कि अगर कोई मुस्लिम भी अपनी बेटी की शादी व्यासपीठ के आगे करवाना चाहता है तो भी वे उनका स्वागत करेंगे।

morari bapu told the greatness of ganga sarayu and godavari

morari bapu told the greatness of ganga sarayu and godavari- फोटो : CITY DESK

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morari bapu told the greatness of ganga sarayu and godavari- फोटो : CITY DESK

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