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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Mirza Ghalib poetry is special on his birth anniversary. Prayagraj has a street named after Ghalib.

Prayagraj : कभी जिस गली में रुसवा हुए थे मिर्जा गालिब, उसी को मिला शायरी के शहंशाह का नाम

Mon, 27 Nov 2023 11:53 AM IST
विनोद सिंह अनूप ओझा, प्रयागराज
अनूप ओझा, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 27 Nov 2023 11:53 AM IST
सार

अपनी गली में मुझको न कर दफ्न बाद-ए-कत्ल/मेरे पते से खल्क को क्यूं तेरा घर मिले...। शायरी के बादशाह मिर्जा गालिब का रुसवाई से भरा यह शेर उनके प्रयागराज प्रवास को लेकर काफी सटीक बैठता है। इस शहर की जिन गलियों से होकर गालिब रुसवा हुए थे, वह रास्ता उनके नाम से सरकारी दस्तावेजों में अमर हो चुका है।

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Mirza Ghalib poetry is special on his birth anniversary. Prayagraj has a street named after Ghalib.
मिर्जा गालिब - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

गलियां हर शहर की पहचान होती हैं। प्रयागराज में कुछ चटोरी गलियां हैं तो कुछ विभूतियों के नाम पर उनकी यादों को सहेजे हुए हैं। लोकनाथ की खानपान की गली की अपनी खूबियां हैं। इसी तरह महात्मा गांधी, महामना मदन मोहन मालवीय, राम मनोहर लोहिया से लेकर सरोजनी नायडू जैसी राजनीतिक हस्तियों के अलावा साहित्यकारों के नाम पर भी मशहूर गलियां हैं। इन गलियों की खूबियां आप अमर उजाला में पढि़ए। सबसे पहले शुरुआत कर रहे हैं मिर्जा गालिब गली से...।

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अपनी गली में मुझको न कर दफ्न बाद-ए-कत्ल/मेरे पते से खल्क को क्यूं तेरा घर मिले...। शायरी के बादशाह मिर्जा गालिब का रुसवाई से भरा यह शेर उनके प्रयागराज प्रवास को लेकर काफी सटीक बैठता है। इस शहर की जिन गलियों से होकर गालिब रुसवा हुए थे, वह रास्ता उनके नाम से सरकारी दस्तावेजों में अमर हो चुका है।
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18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मिर्जा गालिब का चंद समय के लिए इस शहर में आना और नाराज होकर लौटना अब भी रहस्य बना हुआ है। उनकी इस गहरी नाराजगी का जिक्र साहित्यकारों और समीक्षकों ने अलग-अलग तरह से किया है। कहा जाता है कि अपनी मनसबी चराग-ए-दैर लिखते समय वह बनारस,इलाहाबाद समेत देश के कई शहरों से होकर गुजरे थे। प्रसिद्ध कथाकार रवींद्र कालिया ने अपनी किताब गालिब छूटी शराब में उनके यहां आने और नाराज होने के प्रसंग का जिक्र किया है।

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मिर्जा गालिब 1825 में आए थे प्रयागराज

कथाकार कालिया लिखते हैं कि गालिब इलाहाबाद के रास्ते बनारस गए थे। उस दौरान के अपने अनुभवों को उन्होंने अपने एक मित्र को लिखे खत में इस तरह किया है कि ''''अगर जन्नत का रास्ता इलाहाबाद से होकर जाएगा तो मैं जहन्नुम में जाना पसंद करुंगा''''...। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के उर्दू विभागाध्यक्ष रहे प्रो. अली अहमद फात्मी बताते हैं कि मिर्जा गालिब 1825-26 के दौरान यहां आए थे। फात्मी के मुताबिक तब वह बांदा होते हुए अपने एक मुकदमे के सिलसिले में कोलकाता जाते समय एक दिन के लिए यहां रुके थे।

तब मच्छरों ने उन्हें इतना तंग किया कि वह नाराज होकर यहां से लौटे। 1869 में गालिब के इंतकाल के सौ साल बाद 1969 में तत्कालीन मजिस्ट्रेट महमूद बट ने शहर की कई सड़कों का नामकरण शुरू किया था। उसी समय गालिब की सौवीं पुण्यतिथि मनाई गई और पुराने शहर में रोशनबाग तिराहे से जीटी रोड को जोड़ने वाली सड़क को मिर्जा गालिब का नाम दिया गया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. शबनम हमीद बताती हैं कि गालिब प्रयागराज में यमुना किनारे जब रुके थे, तब वह किसी बात को लेकर आहत हो गए थे। अपने दोस्त गुलाम गौश बेखबर को लिखे खत में उन्होंने अपनी नाराजगी जाहिर की है।

शबनम के मुताबिक वह इलाहाबाद में कहां रुके थे, इसका सटीक विवरण कहीं नहीं मिलता, लेकिन यहां ठहरने के दौरान उनका अनुभव बहुत खराब रहा, जिसे उन्होंने फारसी में लिखे अपने पत्र में जाहिर किया है। खुल्दाबाद मोहल्ले में बैंक ऑफ बड़ौदा से अटाला की ओर जाने वाले रास्ते का नामकरण गालिब के नाम पर तब हुआ जब उनकी 100वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही थी।

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