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बैक्टीरिया से लड़ेंगे दुधारू पशु, बढ़ेगा उत्पादन
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Mon, 29 Jan 2018 01:36 AM IST
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दुग्ध उत्पादन की आर्थिकी
- फोटो : अमर उजाला
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सबकुछ ठीक रहा तो आने वाले दिनों में दुधारू पशुओं को बैक्टीरिया के कारण थन में होने वाली मेस्टेटिस जैसी गंभीर बीमारी से स्थायी तौर पर निजात मिल सकेगी और इससे दुग्ध उत्पादन भी बढ़ जाएगा। बीमार पशु के थन में बैक्टीरिया को स्थायी रूप से खत्म किया जा सके, इसके लिए इलाहाबाद विश्वद्यालय का बायोटेक्नोलॉजी विभाग और शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरर साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी ऑफ जम्मू साथ मिलकर तीन साल के एक प्रोजेक्ट पर काम शुरू करने जा रहे हें। दोनों विश्वविद्यालयों को केंद्र के बायोटेक्नोलॉजी विभाग की ओर से 1.18 करोड़ रुपये का अनुदान स्वीकृत किया गया है।
इसके तहत इलाहाबाद विश्वद्यालय को 62 लाख रुपये और जम्मू विश्वविद्यालय को 56 लाख रुपये मंजूर किए गए हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय को तकरीबन 40 लाख रुपये मिल गए हैं। इविवि के बोयोटेक्नोलॉजी विभाग की ओर से डॉ. अवध बिहारी यादव और जम्मू विश्वविद्यालय की ओर से वेटेनरी साइंस के डॉ. नीलेश शर्मा प्रोजेक्ट इंवेस्टिगेटर हैं। डॉ. अवध बिहारी यादव ने बताया बैक्टीरिया के कारण मेस्टेटिस बीमारी से पशुओं के थन में सूजन आ जाती है। इस वजह से दूध का उत्पादन घटकर आधा रह जाता है।
इस बीमारी से निपटने के लिए सिप्रोफ्लॉक्सिन जेंटामाइसिन एंटीबायोटिक पशुओं को इंजेक्शन के माध्यम से दी जाती है। यह एंटीबोयोटिक पशुओं के खून या दूध में मिल जाती है लेकिन कुछ दिनों बाद ही पशुओं के शरीर के माध्यम से एंटीबायोटिक बाहर आ जाती है और बैक्टीरिया फिर हावी हो जाते हैं। बैक्टीरिया को स्थायी रूप से खत्म करने का यही इलाज है कि सिप्रोफ्लॉक्सिन और जेंटामाइसिन एंटीबायोटिक को पाउटर के रूप में तैयार किया जाए और उसके नैनो पार्टिकल सीधे थन की मांस पेशियों में इंजेक्ट कर दिए जाएं। नैनो पार्टिकल मांस पेशियों में ही पड़े रहेंगे और बैक्टीरिया को लौटने का मौका नहीं देंगे। ऐसे में पशुओं को स्थायी रूप से बीमारी से निजात मिल सकेगी और दूध का उत्पादन भी बढ़ेगा।
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इस प्रोजेक्ट के तहत इलाहाबाद विश्वविद्यालय का बायोटेक्नोलॉजी विभाग सिप्रोफ्लॉक्सिन एंटीबायोटिक के नैनो पार्टिकल तैयार करेगा। वहीं, नैनो पार्टिकल तैयार होने के बाद शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरर साइंसेज एंड टेक् नोलॉजी ऑफ जम्मू में बकरी पर इसका प्रयोग करेगा। यानी टेस्टिंग का काम जम्मू विश्वविद्यालय में होगा।
मेस्टेटिस जैसी बीमारी किसी भी दुधारू पशु को हो सकती है। ऐसे में बैक्टीरिया दूध के साथ बाहर आता रहता है। अगर कोई कच्च दूध पीता है तो बैक्टीरिया उस पर भी हमला कर सकता है। ऐसे में बेहतर है कि दूध को उबालने के बाद उसे ठंड कर लें और फिर उसका सेवन करें। इस रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए नेट, जेआरएफ अभ्यर्थियों से आवेदन मांगे गए हैं। आवेदन एक पद के लिए मांगे गए हैं। चयनित छात्र को प्रोजेक्ट के तहत शोध पूरा करने का मौका मिलेगा।
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इसके तहत इलाहाबाद विश्वद्यालय को 62 लाख रुपये और जम्मू विश्वविद्यालय को 56 लाख रुपये मंजूर किए गए हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय को तकरीबन 40 लाख रुपये मिल गए हैं। इविवि के बोयोटेक्नोलॉजी विभाग की ओर से डॉ. अवध बिहारी यादव और जम्मू विश्वविद्यालय की ओर से वेटेनरी साइंस के डॉ. नीलेश शर्मा प्रोजेक्ट इंवेस्टिगेटर हैं। डॉ. अवध बिहारी यादव ने बताया बैक्टीरिया के कारण मेस्टेटिस बीमारी से पशुओं के थन में सूजन आ जाती है। इस वजह से दूध का उत्पादन घटकर आधा रह जाता है।
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इस बीमारी से निपटने के लिए सिप्रोफ्लॉक्सिन जेंटामाइसिन एंटीबायोटिक पशुओं को इंजेक्शन के माध्यम से दी जाती है। यह एंटीबोयोटिक पशुओं के खून या दूध में मिल जाती है लेकिन कुछ दिनों बाद ही पशुओं के शरीर के माध्यम से एंटीबायोटिक बाहर आ जाती है और बैक्टीरिया फिर हावी हो जाते हैं। बैक्टीरिया को स्थायी रूप से खत्म करने का यही इलाज है कि सिप्रोफ्लॉक्सिन और जेंटामाइसिन एंटीबायोटिक को पाउटर के रूप में तैयार किया जाए और उसके नैनो पार्टिकल सीधे थन की मांस पेशियों में इंजेक्ट कर दिए जाएं। नैनो पार्टिकल मांस पेशियों में ही पड़े रहेंगे और बैक्टीरिया को लौटने का मौका नहीं देंगे। ऐसे में पशुओं को स्थायी रूप से बीमारी से निजात मिल सकेगी और दूध का उत्पादन भी बढ़ेगा।
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इस प्रोजेक्ट के तहत इलाहाबाद विश्वविद्यालय का बायोटेक्नोलॉजी विभाग सिप्रोफ्लॉक्सिन एंटीबायोटिक के नैनो पार्टिकल तैयार करेगा। वहीं, नैनो पार्टिकल तैयार होने के बाद शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरर साइंसेज एंड टेक् नोलॉजी ऑफ जम्मू में बकरी पर इसका प्रयोग करेगा। यानी टेस्टिंग का काम जम्मू विश्वविद्यालय में होगा।
मेस्टेटिस जैसी बीमारी किसी भी दुधारू पशु को हो सकती है। ऐसे में बैक्टीरिया दूध के साथ बाहर आता रहता है। अगर कोई कच्च दूध पीता है तो बैक्टीरिया उस पर भी हमला कर सकता है। ऐसे में बेहतर है कि दूध को उबालने के बाद उसे ठंड कर लें और फिर उसका सेवन करें। इस रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए नेट, जेआरएफ अभ्यर्थियों से आवेदन मांगे गए हैं। आवेदन एक पद के लिए मांगे गए हैं। चयनित छात्र को प्रोजेक्ट के तहत शोध पूरा करने का मौका मिलेगा।