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मलाका जेल का आखिरी हिस्सा भी जमींदोज
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sat, 23 Jul 2016 01:51 AM IST
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ब्रिटिश जेल
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जांबाजी का गवाह रही मलाका जेल का आखिरी हिस्सा भी जमींदोज हो गया। इसकी तीन बैरकों में लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) ने अपना स्टोर बनाया था, लेकिन दफ्तर के वहां से हटने के बाद मेडिकल प्रशासन ने उसे पूरी तरह से जमींदोज करवा दिया है। जेल के इस हिस्से में नया भवन बनाया जा रहा है। इसमें सरोजिनी नायडू बाल चिकित्सालय को शिफ्ट किया जाएगा। शासन ने इस हिस्से पर भवन बनाने के लिए करोड़ों रुपये का बजट भी आवंटित कर दिया है।
एसआरएन परिसर 1963 से पहले मलाका जेल हुआ करती थी। 1961 में मेडिकल कॉलेज की स्थापना के बाद कॉलेज को अस्पताल की जरूरत पड़ी तो जेल को ही अस्पताल में परिवर्तित कर दिया गया और पीडब्ल्यूडी को अस्पताल के लिए नया भवन बनाने का जिम्मा मिला। तभी से जेल की तीन बैरकों पर पीडब्ल्यूडी ने अपना कब्जा जमाए रखा। तीनों बैरक पीडब्ल्यूडी का स्टोर थे बीते वर्ष शासन की मंजूरी मिलने के बाद पीडब्ल्यूडी का दफ्तर बने बैरकों पर मोती लाल नेहरू मेडिकल कालेज प्रशासन का कब्जा हो गया। मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने पीडब्ल्यूडी को वहां से हटने को कह दिया। पीडब्ल्यूडी के हटने के बाद बची तीन बैरकों को गिराने का काम शुरू किया गया लेकिन मीडिया में खबरों के आने के बाद बैरकों के ध्वस्तीकरण का कार्य रोक दिया गया था।
कई दिनों पूर्व शासन ने एलनगंज स्थित सरोजिनी नायडू बाल चिकित्सालय को स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय परिसर में स्थानांतरित किए जाने के लिए हरी झंडी दिखाई तो ध्वस्तीकरण का कार्य फिर शुरू हुआ और तीनों बैरकों को गिरा दिया गया। इसी के साथ मलाका जेल की आखिरी ईंट भी गुम हो गई।
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आजादी के संघर्षों का गवाह रही एक ऐतिहासिक विरासत इतिहास के पन्नों तक सिमट गई। इसकी परवाह न तो मेडिकल प्रशासन को रही और न ही शासन को। मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ.एसपी सिंह कहते हैं, विरासत के नाम पर अब सिर्फ शहीद रोशन सिंह की प्रतिमा भर रह गई है, जिसे 1972 में स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय भवन बनवाने वाले ठेकेदार जगदेव दास यादव की ओर से स्थापित कराई गई थी।
अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए वर्ष 1925 में मलाका जेल बनवाया था। देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी 1857 से ही आजादी की जंग शुरू हो गई थी। ऐसे में अंग्रेजों के सामने यह समस्या थी कि ऐसे कैदियों को कहां रखा जाए। इसी मकसद से 1925 में मलाका बनवाई। मोती लाल नेहरू मेेडिकल कॉलेज के 17वें बैच के छात्र रहे सीनियर कंसल्टेंट सर्जन डॉ.नीरज त्रिपाठी कहते हैं, स्वरूपरानी नेहरू (एसआरएन) चिकित्सालय का पूरा हिस्सा ही मलाका जेल के नाम से जाना जाता था।
इसकी सीमा स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय के प्रवेश द्वार से लेकर सीएवी इंटर कॉलेज तक थी। यह जेल चर्चा तब आई जब काकोरी कांड में शामिल ठाकुर रोशन सिंह को यहां लाकर 19 दिसंबर 1927 को फांसी पर लटकाया गया। तब पोस्टमार्टम हाउस फांसी घर हुआ करता था। ठाकुर रोशन सिंह को भी यहीं फांसी दी गई थी। फिलहाल एसआरएन परिसर में शहीद रोशन सिंह की प्रतिमा स्थापित है।
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एसआरएन परिसर 1963 से पहले मलाका जेल हुआ करती थी। 1961 में मेडिकल कॉलेज की स्थापना के बाद कॉलेज को अस्पताल की जरूरत पड़ी तो जेल को ही अस्पताल में परिवर्तित कर दिया गया और पीडब्ल्यूडी को अस्पताल के लिए नया भवन बनाने का जिम्मा मिला। तभी से जेल की तीन बैरकों पर पीडब्ल्यूडी ने अपना कब्जा जमाए रखा। तीनों बैरक पीडब्ल्यूडी का स्टोर थे बीते वर्ष शासन की मंजूरी मिलने के बाद पीडब्ल्यूडी का दफ्तर बने बैरकों पर मोती लाल नेहरू मेडिकल कालेज प्रशासन का कब्जा हो गया। मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने पीडब्ल्यूडी को वहां से हटने को कह दिया। पीडब्ल्यूडी के हटने के बाद बची तीन बैरकों को गिराने का काम शुरू किया गया लेकिन मीडिया में खबरों के आने के बाद बैरकों के ध्वस्तीकरण का कार्य रोक दिया गया था।
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कई दिनों पूर्व शासन ने एलनगंज स्थित सरोजिनी नायडू बाल चिकित्सालय को स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय परिसर में स्थानांतरित किए जाने के लिए हरी झंडी दिखाई तो ध्वस्तीकरण का कार्य फिर शुरू हुआ और तीनों बैरकों को गिरा दिया गया। इसी के साथ मलाका जेल की आखिरी ईंट भी गुम हो गई।
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आजादी के संघर्षों का गवाह रही एक ऐतिहासिक विरासत इतिहास के पन्नों तक सिमट गई। इसकी परवाह न तो मेडिकल प्रशासन को रही और न ही शासन को। मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ.एसपी सिंह कहते हैं, विरासत के नाम पर अब सिर्फ शहीद रोशन सिंह की प्रतिमा भर रह गई है, जिसे 1972 में स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय भवन बनवाने वाले ठेकेदार जगदेव दास यादव की ओर से स्थापित कराई गई थी।
अंग्रेजों ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए वर्ष 1925 में मलाका जेल बनवाया था। देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी 1857 से ही आजादी की जंग शुरू हो गई थी। ऐसे में अंग्रेजों के सामने यह समस्या थी कि ऐसे कैदियों को कहां रखा जाए। इसी मकसद से 1925 में मलाका बनवाई। मोती लाल नेहरू मेेडिकल कॉलेज के 17वें बैच के छात्र रहे सीनियर कंसल्टेंट सर्जन डॉ.नीरज त्रिपाठी कहते हैं, स्वरूपरानी नेहरू (एसआरएन) चिकित्सालय का पूरा हिस्सा ही मलाका जेल के नाम से जाना जाता था।
इसकी सीमा स्वरूपरानी नेहरू चिकित्सालय के प्रवेश द्वार से लेकर सीएवी इंटर कॉलेज तक थी। यह जेल चर्चा तब आई जब काकोरी कांड में शामिल ठाकुर रोशन सिंह को यहां लाकर 19 दिसंबर 1927 को फांसी पर लटकाया गया। तब पोस्टमार्टम हाउस फांसी घर हुआ करता था। ठाकुर रोशन सिंह को भी यहीं फांसी दी गई थी। फिलहाल एसआरएन परिसर में शहीद रोशन सिंह की प्रतिमा स्थापित है।