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परीक्षा प्रारूप में एकरूपता नहीं होने से बढ़ी चुनौती

Sat, 26 Mar 2016 02:24 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sat, 26 Mar 2016 02:24 AM IST
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Lack of uniformity in examination format increased challenge
बोर्ड कॉपियों की जांच - फोटो : demo pic
नए परीक्षा प्रारूप को लेकर निर्णय में देरी की वजह से प्रतियोगियों के सामने तैयारी में तालमेल बैठाना सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। संघ लोक सेवा आयोग तथा राज्य लोक सेवा आयोग की हर परीक्षा का प्रारूप अलग-अलग है। इतना ही नहीं अलग-अलग राज्य आयोगों की पीसीएस भर्ती परीक्षा के प्रारूप में भी अंतर है। इससे भी प्रतियोगियों की परेशानी बढ़ गई है।
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पहले सिविल सेवा, पीसीएस, लोअर सबऑर्डिनेट और आरओ-एआरओ भर्ती परीक्षा का प्रारूप एक था। मुख्य परीक्षा अभ्यर्थियों को दो वैकल्पिक विषय चुनने होते थे, लेकिन अब इनमें व्यापक बदलाव हो गया है। सिविल सेवा मुख्य परीक्षा में अब सिर्फ एक वैकल्पिक विषय रह गया है। इसके विपरीत यूपी पीसीएस में दो वैकल्पिक विषय की व्यवस्था अब भी बनी हुई है। गौर करने वाली बात यह है कि कई राज्य लोक सेवा आयोगों ने सिविल सेवा की तर्ज पर परीक्षा प्रारूप में बदलाव कर लिया है। वहीं उत्तर प्रदेश के साथ कई अन्य राज्य आयोग भी पुराने पैटर्न पर परीक्षा करा रहे हैं। इससे इतर लोअर सबऑर्डिनेट और समीक्षा अधिकारी-सहायक समीक्षा अधिकारी भर्ती परीक्षा में सामान्य अध्ययन के अलावा हिन्दी का महत्व बढ़ गया है।
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इन भर्तियों की मुख्य परीक्षा में सामान्य अध्ययन, हिन्दी, निबंध के पेपर होते हैं। वैकल्पिक विषय के पेपर नहीं होते। ऐसे में प्रतियोगियों को हर परीक्षा के लिए अलग-अलग तैयारी करनी होती है। प्रतियोगी आशीष सिंह, रोहित माथुर, शालिनी अवस्थी का कहना है कि कंप्टीशन बढ़ गया है। ऐसे में सभी भर्तियों के आवेदन करना पड़ता है। ये सभी भर्ती परीक्षाएं एक साथ पूरे साल चलती हैं। कई बार तो दो परीक्षाओं के बीच में काफी कम अंतर होता है। इनका कहना है कि सिविल सेवा की तर्ज पर पीसीएस का प्रारूप निर्धारित करने की मांग लंबे समय से की जा रही है, लेकिन सरकार का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। प्रतियोगियों के संगठन की ओर से आयोग में कई बार ज्ञापन भी सौंपा जा चुका है। प्रतियोगियों की मांग के साथ लोक सेवा आयोग की ओर से भी इसका प्रस्ताव शासन को भेजा गया था, लेकिन सरकार ने उसे वापस कर दिया। अनिल यादव के जाने इसके लिए एक बार फिर कवायद शुरू की गई, लेकिन अभी तक प्रस्ताव नहीं भेजा जा सका।
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