{"_id":"00b977b69dd66ddb0916eca8ff55dcd4","slug":"koli-delay-in-disposal-of-the-mercy-petition-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"कोली की दया याचिका के निस्तारण में नहीं हुई देरी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कोली की दया याचिका के निस्तारण में नहीं हुई देरी
ब्यूरो/अमर उजाला इलाहाबाद
Updated Sat, 17 Jan 2015 01:58 AM IST
विज्ञापन
इलाहाबाद (ब्यूरो)। निठारी कांड में फांसी की सजा पाए सुरेंद्र कोली की सजा पर 28 जनवरी तक रोक जारी रहेगी। हाईकोर्ट ने कोली की सजा को उम्रकैद मेें बदलने के लिए दाखिल याचिकाओं की सुनवाई करते हुए रोक बढ़ा दी है। शुक्रवार को पक्षकारों के बीच दिन भर चली बहस के बाद अदालत ने सुनवाई की अगली तारीख 27 जनवरी तय कर दी है। इस दौरान केंद्र सरकार के अपर सॉलीसिटर जनरल अशोक मेहता ने दया याचिका से संबंधित पत्रावलियां हाईकोर्ट में प्रस्तुत की। केंद्र ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि कोली की दया याचिका प्राप्त होने के बाद मात्र साढ़े सात माह मेें इसका निस्तारण कर दिया गया। इस समय को असाधारण देरी नहीं कहा जा सकता है।
पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट और सुरेंद्र कोली द्वारा दाखिल याचिका में आधार लिया गया है कि कोली की फांसी के खिलाफ अपील सुप्रीमकोर्ट से खारिज होने के बाद उसकी दया याचिका के निस्तारण मेें तीन वर्ष तीन माह का अनावश्यक समय लिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत यह बंदी के अधिकारों का हनन है। मौत की सजा पाए व्यक्ति को बिना किसी निर्णय के इतने समय तक इंतजार कराना अनुचित है। शत्रुघन चौहान केस में दया याचिकाओं के निस्तारण को लेकर सुप्रीमकोर्ट द्वारा दी गई गाइड लाइन का हवाला भी दिया गया। विलंब के आधार पर फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने की मांग की गई है।
एडीशनल सॉलीसिटर जनरल अशोक मेहता और महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह की दलील थी कि फांसी की सजा के क्रियान्वयन देरी के लिए स्वयं कोली ही जिम्मेदार है। सरकारी पक्ष ने इस दलील को खारिज किया कि कोली कम शिक्षित और गरीब व्यक्ति है तथा सही विधिक सहायता प्राप्त नहीं हो सकी। दावा किया कि कोली ने अपनी अपील के लिए हाईकोर्ट के सबसे बड़े वकील की सेवाएं ली। वह लगातार प्रार्थनापत्र, पुनरीक्षण याचिकाएं और अपीलें आदि दाखिल करता रहा, जिसकी वजह से फांसी की सजा के क्रियान्वयन में देरी हुई। जेल अधिकारी कोई भी याचिका लंबित रहते फांसी देने का निर्णय नहीं ले सकते हैं। महाधिवक्ता ने कहा कि अपराधी के कृत्य को समग्रता से देखा जाना चाहिए। देरी सिर्फ एक पहलू है। कोली ने समाज के प्रति जघन्य अपराध किया है।
विज्ञापन
याचिकाओं पर सुनवाई कर रही मुख्य न्यायमूर्ति डॉ. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति पीकेएस बघेल की खंडपीठ ने प्रश्न उठाया कि दया याचिका के निस्तारण में प्रदेश सरकार ने दो वर्ष से अधिक का समय लिया। उस समय शत्रुघन चौहान केस की सुप्रीमकोर्ट की गाइड लाइन नहीं आई थी। मगर जब मामला केंद्र सरकार के पास पहुंचा तब गाइड लाइन आ चुकी थी। केंद्र सरकार को देरी का मामला उठाना चाहिए था। सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकार द्वारा दाखिल दस्तावेजों और अदालत ने सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है।
विज्ञापन
पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट और सुरेंद्र कोली द्वारा दाखिल याचिका में आधार लिया गया है कि कोली की फांसी के खिलाफ अपील सुप्रीमकोर्ट से खारिज होने के बाद उसकी दया याचिका के निस्तारण मेें तीन वर्ष तीन माह का अनावश्यक समय लिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत यह बंदी के अधिकारों का हनन है। मौत की सजा पाए व्यक्ति को बिना किसी निर्णय के इतने समय तक इंतजार कराना अनुचित है। शत्रुघन चौहान केस में दया याचिकाओं के निस्तारण को लेकर सुप्रीमकोर्ट द्वारा दी गई गाइड लाइन का हवाला भी दिया गया। विलंब के आधार पर फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने की मांग की गई है।
विज्ञापन
एडीशनल सॉलीसिटर जनरल अशोक मेहता और महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह की दलील थी कि फांसी की सजा के क्रियान्वयन देरी के लिए स्वयं कोली ही जिम्मेदार है। सरकारी पक्ष ने इस दलील को खारिज किया कि कोली कम शिक्षित और गरीब व्यक्ति है तथा सही विधिक सहायता प्राप्त नहीं हो सकी। दावा किया कि कोली ने अपनी अपील के लिए हाईकोर्ट के सबसे बड़े वकील की सेवाएं ली। वह लगातार प्रार्थनापत्र, पुनरीक्षण याचिकाएं और अपीलें आदि दाखिल करता रहा, जिसकी वजह से फांसी की सजा के क्रियान्वयन में देरी हुई। जेल अधिकारी कोई भी याचिका लंबित रहते फांसी देने का निर्णय नहीं ले सकते हैं। महाधिवक्ता ने कहा कि अपराधी के कृत्य को समग्रता से देखा जाना चाहिए। देरी सिर्फ एक पहलू है। कोली ने समाज के प्रति जघन्य अपराध किया है।
विज्ञापन
याचिकाओं पर सुनवाई कर रही मुख्य न्यायमूर्ति डॉ. डीवाई चंद्रचूड और न्यायमूर्ति पीकेएस बघेल की खंडपीठ ने प्रश्न उठाया कि दया याचिका के निस्तारण में प्रदेश सरकार ने दो वर्ष से अधिक का समय लिया। उस समय शत्रुघन चौहान केस की सुप्रीमकोर्ट की गाइड लाइन नहीं आई थी। मगर जब मामला केंद्र सरकार के पास पहुंचा तब गाइड लाइन आ चुकी थी। केंद्र सरकार को देरी का मामला उठाना चाहिए था। सुनवाई के दौरान केंद्र और राज्य सरकार द्वारा दाखिल दस्तावेजों और अदालत ने सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है।