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mahakumbh : कीर्तन ने लठिया दी लट्ठमार भाषा...बन गए महाकुंभ के महाउद्घोषक
Sun, 23 Feb 2025 04:32 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, महाकुंभ नगर (प्रयागराज)
अमर उजाला नेटवर्क, महाकुंभ नगर (प्रयागराज)
Published by: विनोद सिंह
Updated Sun, 23 Feb 2025 04:32 PM IST
सार
प्रयागराज के मांडा क्षेत्र के गांव टिकरी के रहने वाले हरिश्चंद्र बताते हैं, हम तीनों 2001 में होमगार्ड सेवा में आए। दोनों दोस्त हैं भी पड़ोसी गांव सोनाई के। हमारी नौकरी थी, वाच टॉवर की सुरक्षा की। तब, एक गुप्ताजी खोया-पाया की सूचना देते थे। एक दिन उनका गला लड़खड़ाया तो हमें हुक्म हुआ माइक संभालने का। तब से चला सिलसिला 25 बरस तक जारी है।
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महाकुंभ के महाउद्घोषक।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
महाकुंभ में आने वाले करोड़ों श्रद्धालुओं के प्रबंधन के तरीके तो बहुतेरे हैं, लेकिन कारगर तरीका है तिमंजिले वाच टॉवर से भीड़ संभालने का। यह चुनौतीपूर्ण काम संभालती है, होमगार्डों की तिकड़ी। इसमें शामिल हैं... हरिश्चंद्र, विमल शर्मा और जगन्नाथ पटेल। ये माइक पर ऐसे बोलते हैं, जैसे किसी से सीधे बतिया रहे हों। लोग चौंक उठते हैं सुनकर... दाएं-बाएं देखने लगते हैं। लोग उनके आग्रह को मानते भी हैं।
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प्रयागराज के मांडा क्षेत्र के गांव टिकरी के रहने वाले हरिश्चंद्र बताते हैं, हम तीनों 2001 में होमगार्ड सेवा में आए। दोनों दोस्त हैं भी पड़ोसी गांव सोनाई के। हमारी नौकरी थी, वाच टॉवर की सुरक्षा की। तब, एक गुप्ताजी खोया-पाया की सूचना देते थे। एक दिन उनका गला लड़खड़ाया तो हमें हुक्म हुआ माइक संभालने का। तब से चला सिलसिला 25 बरस तक जारी है। वैसे, शुरू में हम पांच की ड्यूटी लगी थी, लेकिन टिक पाए सिर्फ हम तीन। इसलिए, कि हम सबका गला अच्छा था और भाषा भी शालीन-लोचदार।
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हमारी भाषा आई कीर्तन से। उस वक्त बहुत पैसा तो था नहीं होमगार्ड सेवा में। सो, गांव में कीर्तन कर लिया करते थे। दो-तीन घंटे ढोल-मंजीरा बजाते, बदले में खाना-पीना हो जाता। धीरे-धीरे जबान सुधरी और लट्ठमार भाषा लठिया दी गई। महाकुंभ, कुंभ और माघ मेले में सेवाएं देते-देते यह इतनी दुनियादारी देख चुके हैं कि अपना क्रोध गंगाजल की तरह पी गए। आइए सुनिए, इनकी बोली-इनकी बानी...
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- ए भइया...अरे ओ बहनजी... अरे ओ हेलमेट वाले बाबू जी... बाइक पार्किंग में खड़ी कर दो।
- यह पैदल चलने वालों का रास्ता है। इसमें आप लोग न चलो। आप चलोगे तो पैदल वाले लोग कैसे निकलेंगे...।
- ए स्कूटी वाली बहनजी... आप स्कूटी लेकर गलत जगह खड़ी हो...। वहां से आगे बिल्कुल मत जाओ... लौट आओ वहां से।
- ए फूल वाले...आप लोगों को तंग मत करो, पब्लिक के बीच जाकर...। व्यवस्था बनाने में सहयोग करो।
- ए चंदन-टीका लगाने वाले भैया...बीच में मत घूमो। बोरी बिछाकर दूर बैठो। अरे आप पब्लिक में जाओगे तो लोग कैसे जा पाएंगे नहाने..।
- अरे ओ बाल बनाने वाले भाई... भीड़ में कहां घूम रहे हो। आपके लिए तो एक एकड़ जमीन दी गई है नाईबाड़ा में। आप वहीं रहो। यहां बाल न बनाओ।
- देखो ओ काले हेलमेट वाले भैया... गाड़ी बैक कर लो...।
- स्कूटी वाले भाई...हॉर्न न बजाओ। आप उल्टी दिशा में जा रहे हो, लौटो वहां से।
- ए बहनजी... लाल साड़ी वाली बहनजी... अरे थोड़ा हमारी भी सुन लो। हाथ जोड़कर विनती है हमारी...आगे बढ़ो। वहां खड़ी न रहो। देखो पीछे से एंबुलेंस आ रही है...उसे रास्ता दे दो।
- संगम नहा रहे बाबूजी... अब आप नहा चुके। पांच डुबकी हो गई हैं आपकी। हां...आपसे ही कह रहे हैं...सफेद बाल वाले बाबूजी...। अब दूसरों को मौका दो...। पुण्य की डुबकी सबको लगानी है।
- ध्यान दीजिए साथियों .. यमुना पट्टी से लेकर गंगा पट्टी तक कहीं भी गहराई में जाने की जरूरत नहीं है। यह पुण्य प्रतापी भूमि है...कहीं भी स्नान करो, इसका पूरा फल मिलेगा।
- और हां... अपने सामान की सुरक्षा भी करते रहो।
- ...अरे ओ काली बाइक वाले भाई...तीन सवारी क्यों जा रहे हो। तुरंत लौटो वहां से, नहीं तो चालान हो जाएगा।
- देखो साथियो...यह संगम है... आप सब लोग संगम में आए हैं। संगम बहुत ही पुण्य जगह है। यहां स्नान करके लौटो तो अपनी बुराइयां त्यागकर। ध्यान रखो...माता-पिता का ऋण कोई नहीं चुका सका है। इसलिए, उनका खूब ध्यान रखो ...सेवा करो। गंगा मैया आपका कल्याण करें।
गंगा मैया की जय...!