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केशव की लोकप्रियता और संगठन की सक्रियता पर उठी अंगुली
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Thu, 15 Mar 2018 01:30 AM IST
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keshav prasad maurya
- फोटो : amar ujala
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उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के चुनावी कमान संभालने एवं उनके द्वारा किए गए तमाम वादों के बाद भी जनता ने भाजपा को जनादेश नहीं दिया। पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेता, पदाधिकारी और कार्यकर्ता दफ्तरों में बैठकर चुनावी तैयारियों की समीक्षा करते रहे लेकिन शहरी क्षेत्र के मतदाताओं को मतदान केंद्र तक नहीं ले जा सके। भाजपाइयोें ने सीएम योगी आदित्यनाथ की पांच चुनावी सभाओं एवं केशव प्रसाद मौर्य की दर्जनों सभाओं से ही करिश्मे की उम्मीद पाल रखी थी। लेकिन जातीय फैक्टर, ब्राह्मणों की नाराजगी, दलितों द्वारा सपा को गले लगा देने से भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य की सीट गंवा दी।
केशव के सांसद बनने से पूर्व फूलपुर में कभी भी भाजपा जीती नहीं थी। वर्ष 2014 की मोदी लहर में केशव प्रसाद मौर्य ने भाजपा का खाता खोला था। तब उन्हें तीन लाख से ज्यादा मतों से विजय मिली थी। इस बार सपा ने भाजपा से एक बार फिर से यह सीट छीन ली है। डिप्टी सीएम के लिए यह चुनाव भी किसी परीक्षा से कम नहीं था। उनके परीक्षा में फेल होने की कई वजहों में पार्टी प्रत्याशी के बाहरी होने की एक छवि बनी। 2017 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश में केशव की अगुवाई में लड़ा गया। इस चुनाव में पीएम मोदी और अमित शाह के बाद प्रचंड बहुमत हासिल करने का श्रेय केशव को भी मिला। हालांकि महज 11 माह बाद केशव अपनी छोड़ी सीट बचा नहीं सके। उनकी लोकप्रियता और संगठन की सक्रियता पर भी अंगुली उठ रही है। इस बीच ग्रामीण इलाकों में भाजपा को मिले मत भी केशव की लोकप्रियता गिरा रहे हैं। मतदान के दिन सोरांव विधानसभा के तमाम इलाकों में अति पिछड़े वर्ग के वोटरों की नाराजगी भी सामने आई थी। यहां जूड़ापुर कांड को लेकर तमाम लोगों ने मतदान का बहिष्कार भी कर दिया था।
समाजवादी पार्टी के मुकाबले भाजपा की संगठनात्मक रणनीति भी फेल हो गई। भाजपा ने दावा किया था कि वह अपनी पांचों विधानसभाओं के बूथों पर पन्ना प्रमुख लगाएगा। इतना ही नहीं बूथ कमेटी का गठन भी नए सिरे से करने की बात कही गई थी। यहां प्रदेश महामंत्री गोविंद नारायण शुक्ला, विधायक भूपेश चौबे, अमरपाल मौर्य आदि ने संगठन की मजबूती के लिए कागजों पर तो काम किया, लेकिन धरातल पर उसका असर नहीं दिखा। कहीं भी भाजपा की रणनीति कामयाब नहीं हुई। उत्तरी में मामूली अंतर तो पश्चिमी में सिद्धार्थनाथ की वजह से भाजपा ने थोड़ी बढ़त तो बनाई लेकिन फाफामऊ, फूलपुर और सोरांव में पार्टी बहुत अच्छा नहीं कर सकी।
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केशव के सांसद बनने से पूर्व फूलपुर में कभी भी भाजपा जीती नहीं थी। वर्ष 2014 की मोदी लहर में केशव प्रसाद मौर्य ने भाजपा का खाता खोला था। तब उन्हें तीन लाख से ज्यादा मतों से विजय मिली थी। इस बार सपा ने भाजपा से एक बार फिर से यह सीट छीन ली है। डिप्टी सीएम के लिए यह चुनाव भी किसी परीक्षा से कम नहीं था। उनके परीक्षा में फेल होने की कई वजहों में पार्टी प्रत्याशी के बाहरी होने की एक छवि बनी। 2017 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश में केशव की अगुवाई में लड़ा गया। इस चुनाव में पीएम मोदी और अमित शाह के बाद प्रचंड बहुमत हासिल करने का श्रेय केशव को भी मिला। हालांकि महज 11 माह बाद केशव अपनी छोड़ी सीट बचा नहीं सके। उनकी लोकप्रियता और संगठन की सक्रियता पर भी अंगुली उठ रही है। इस बीच ग्रामीण इलाकों में भाजपा को मिले मत भी केशव की लोकप्रियता गिरा रहे हैं। मतदान के दिन सोरांव विधानसभा के तमाम इलाकों में अति पिछड़े वर्ग के वोटरों की नाराजगी भी सामने आई थी। यहां जूड़ापुर कांड को लेकर तमाम लोगों ने मतदान का बहिष्कार भी कर दिया था।
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समाजवादी पार्टी के मुकाबले भाजपा की संगठनात्मक रणनीति भी फेल हो गई। भाजपा ने दावा किया था कि वह अपनी पांचों विधानसभाओं के बूथों पर पन्ना प्रमुख लगाएगा। इतना ही नहीं बूथ कमेटी का गठन भी नए सिरे से करने की बात कही गई थी। यहां प्रदेश महामंत्री गोविंद नारायण शुक्ला, विधायक भूपेश चौबे, अमरपाल मौर्य आदि ने संगठन की मजबूती के लिए कागजों पर तो काम किया, लेकिन धरातल पर उसका असर नहीं दिखा। कहीं भी भाजपा की रणनीति कामयाब नहीं हुई। उत्तरी में मामूली अंतर तो पश्चिमी में सिद्धार्थनाथ की वजह से भाजपा ने थोड़ी बढ़त तो बनाई लेकिन फाफामऊ, फूलपुर और सोरांव में पार्टी बहुत अच्छा नहीं कर सकी।
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