Prayagraj : कहार जाति ने मांगा अनुसूचित जाति का आरक्षण, हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया
याचिका में कहा गया है कि कहार समुदाय को यूपी में केंद्र और राज्य सरकार दोनों की ही ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग की लिस्ट में रखा गया है। उन्हें यह दर्जा अंग्रेजों के राज में 1881 से ही दिया गया है। याची के अधिवक्ता राकेश कुमार गुप्ता की दलील है कि कहार कोई जाति नहीं है, बल्कि पेशेगत काम करने वालों का समूह है।
विस्तार
अन्य पिछड़ा वर्ग के सूची में शामिल कहार समुदाय के लोग अनुसूचित जाति की मान्यता चाहते हैं। अपनी मांग को लेकर उन्होंने हाईकोर्ट दरवाजा खटखटाया है। कोर्ट ने सरकार से जवाब तलब किया है। यह आदेश न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने गोरखपुर के धूरिया जनजाति सेवा संस्थान के अध्यक्ष राम अवध गोंड की ओर से दाखिल की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।
याचिका में कहा गया है कि कहार समुदाय को यूपी में केंद्र और राज्य सरकार दोनों की ही ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग की लिस्ट में रखा गया है। उन्हें यह दर्जा अंग्रेजों के राज में 1881 से ही दिया गया है। याची के अधिवक्ता राकेश कुमार गुप्ता की दलील है कि कहार कोई जाति नहीं है, बल्कि पेशेगत काम करने वालों का समूह है। कहार समुदाय के लोग डोली उठने, पानी भरने, सिंघाड़े की खेती करने और मछली पालन का काम करते हैं।
ओबीसी सूची में चौथे नंबर की जाति है कहार
याची का दावा है कि कहार के पेशे से जुड़े परंपरागत काम करने वाले लोगों में ज्यादातर 11 जनजातीय यानी ट्राइब्स के लोग होते हैं। इनमें मुख्य रूप से भोई, धीमर, धुरिया, गुरिया, गोंड, कलेनी, कमलेथर, हुर्का, मछेरा, महारा, पनभरा और सिंघाड़िया शामिल हैं। इन जातियों को कहीं एससी की कैटेगरी में रखा गया है तो कहीं एसटी की कैटेगरी में उत्तर प्रदेश में केंद्र और राज्य सरकार दोनों की ही ओबीसी लिस्ट में कहार समुदाय को चौथे नंबर पर रखा गया है। इस वजह से रेवेन्यू डिपार्टमेंट के लोग इन्हें ओबीसी कैटेगरी का ही कास्ट सर्टिफिकेट देते हैं। जबकि, इन्हें एससी या एसटी का जाति प्रमाण पत्र मिलना चाहिए। अगली सुनवाई 15 अक्तूबर को होगी।